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जमीन चिन्हित होने के तीन वर्ष बाद भी नहीं मिल पाई स्वीकृति

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जमानिया। स्थानीय तहसील की स्थापना का 115 वर्ष बीत जाने के बाद भी मुंसिफ न्यायालय की आज तक स्थापना नहीं हो सकी है। जबकि तीन वर्ष पूर्व मुंसिफ न्यायालय के भवन निर्माण के लिए जमीन चिन्हित कर कागज उच्च न्यायालय के प्रशासनिक विभाग भेज दी गई थी। लेकिन आज तक भवन निर्माण की स्वीकृति नहीं मिल पाई। भवन निर्माण के लिए अधिवक्ताओं ने लगातार कई महीनों तक न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया और प्रदेश सरकार से लेकर उच्च न्यायालय तक गुुहार लगाई।
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कई बार तत्कालीन जिला जज और जिलाधिकारी ने मुंसिफ न्यायालय बनवाने का भरोसा दिया था। वर्ष 1904 में जमानियां तहसील की स्थापना हुई थी। वर्ष 1954 से तहसील का कामकाज शुरू हो गया। तहसील बने करीब 115 वर्ष बीत गए लेकिन यहां मुंसिफ न्यायालय की स्थापना नहीं हो पाई। जबकि इसके बाद स्थापित तहसीलों में बहुत पहले ही मुंसिफ न्यायालय की स्थापना हो चुकी है। न्यायालय की स्थापना के प्रति तहसील की उपेक्षा से लाखों लोग मायूस है। पूर्व की सपा सरकार ने इस तहसील का बंटवारा कर एक नई तहसील सेवराई की स्थापना कर दिया है। लेकिन मुंसिफ न्यायालय बनाने के प्रति उदासीन रही।

अब क्षेत्रीय लोग भाजपा सरकार से उम्मीद लगाए हैं। तत्काल और सस्ता इंसाफ मुहैया कराने में सहायक मुंसिफ न्यायालय की मांग को लेकर तहसील में कार्यरत अधिवक्ताओं और क्षेत्रवासियों ने लंबे समय तक आंदोलन भी किया। मुंसिफ न्यायालय नहीं होने से करीब साढ़े 6 लाख की आबादी वाले तहसील क्षेत्र के लोगों को सिविल, फौजदारी, भरणपोषण, एमवी एक्ट आदि के मुकदमे के लिए जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। करीब 50 किमी की दूरी तय कर जिला मुख्यालय पहुंचने वाले वादी-प्रतिवादियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार अदालत में शाम हो जाने के चलते उनको अपने घर तक पहुंचने के लिए वाहन तक नहीं मिलता है। ऐसे में उनकी रात रिश्तेदार के पास और रेलवे स्टेशन परिसर में बीतता है। जिला मुख्यालय आने जाने में उनको अधिक रकम भी खर्च करना पड़ता है। मुंसफ न्यायालय की स्थापना हो तो लाखों आबादी को इसका फायदा होगा।
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