गंगा सहित सहायक नदियों का गिर रहे जलस्तर से खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई है। विकास की चाह मेें जगह-जगह बांध बनाकर हमेशा प्रवाहशील रहने वाली नदियों के पानी को रोका जाना विनाश की ओर ढकेल रहा है। गंगा के जलस्तर में दो दिन के अंतराल में दो सेमी की गिरावट आ रही है। वहीं, भूजल स्तर भी तेजी से गिरना शुरू हो गया है। भीषण गर्मी शुरू होने से पहले ही प्रवाहशील मानी जाने वाली गंगा सहित सहायक नदियों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। गंगा की प्रवाहशीलता को निर्धारित कर बांधों से नहीं छोड़ा गया तो गंगा के किनारे बसे शहरों में पेयजल की आपूर्ति के लिए लोगों को जद्दोजहद करनी पड़ सकती है।
जल आयोग का माना जाए तो गंगा के जलस्तर में फरवरी से लेकर मार्च माह तक काफी गिरावट आई है। दो दिन के अंतराल पर गंगा का जलस्तर एक से दो सेंटीमीटर घटता जा रहा है, जो विनाश का संकेत दिखा रहा है। आयोग के अनुसार, एक तरफ गंगा का जलस्तर अभी और गिरने के संकेत हैं तो दूसरी तरफ पर्याप्त वर्षा और भू जलस्तर के संरक्षण की कोई व्यवस्था न होने से दिन पर दिन गिरता जा रहा है। दस वर्षों के आंकड़ों को देखा जाए तो जहां 30 से 40 मीटर तक खुदाई करने पर पानी मिल जाता था लेकिन अब पानी के लिए 70 से 80 मीटर तक खुदाई करनी पड़ती है। गंगा सहित सहायक नदियों और भूजल स्तर में हो रही गिरावट से गरमी के दिनों में प्यास बुझाना मुश्किल हो जाएगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जनपद स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए कोई व्यवस्था तक नहीं है। उधर, गंगा की सहायक नदियों का अस्तित्व भी खतरे में नजर आ रहा है। जिले में बहने वाली गांगी, गोमती, टोंस, मगई, बेसो, तमसा आदि नदियों का अस्तित्व खतरे में है। इन नदियों में नाममात्र ही पानी बचा है। अभी से ज्यादातर नदियां नाले का रूप ले चुकी हैं। आने वाले मई और जून महीने में इनका अस्तित्व बचेगा या नहीं यह कहना मुश्किल है।