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पौधे लगाकर भूल जाते हैं देखभाल करना

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गाजीपुर। नेता हों या अफसर अथवा सामाजिक संगठनों के लोग कुछ खास मौकों पर पौधे लगाने का तो शौक रखते हैं, लेकिन बाद में उसकी देखभाल का जिम्मा कोई नहीं लेता। इस पर ध्यान न देने के कारण गंगा के तटवर्ती इस जिले में हरियाली लगातार घटती जा रही है। पौधरोपण के बाद अधिकांश पौधे पेड़ बनने से पहले ही सूख कर नष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर हरे-भरे पेड़ काटने की प्रवृत्ति पर प्रभावी ढंग से अंकुश तक नहीं लग पाता है और समाज तथा संगठनों के सामने ही पेड़ों की अवैध कटाई जारी रहती है।
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गंगा के मुहाने पर बसे लहुरी काशी (गाजीपुर) में कभी हरियाली भरपूर थी, लेकिन इसे सहेजने के प्रति हमेशा लोग उदासीन रहे। पुराने रिकार्ड के मुताबिक लगभग 12 हजार 188 हेक्टेयर इलाका प्राकृतिक जंगल से आच्छादित था। पूरे जंगल को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया गया। जिले की आबादी भी तेजी से बढ़ती गई। सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में एक दशक पहले तक जहां हरे-भरे बाग-बागीचे हुआ करते थे, वहां अब रिहायशी मकान खड़े हैं। लकड़ी माफिया हरे वृक्षों को निरंतर काटने लगे हैँ। इसे काटने के लिए जैसे-तैसे परमिट ले लिया जाता है। हद तो यह है कि जितने का परमिट जारी होता है, उससे दोगुनी संख्या में पेड़ों का कटान किया जाता है। इसमें एक तरफ जहां पुराने पेड़ कटते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पौधरोपण के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है। हर साल जुलाई माह में पौधरोपण के लक्ष्य सरकारी विभागों व ग्राम पंचायतों को दिए जाते हैं। अधिकारी, नेता और सामाजिक संगठनों के अधिकतर लोगों का रवैया यह है कि पौधे तो लगा दिए जाते हैं, लेकिन उनकी उचित देखभाल के इंतजाम ही नहीं किए जाते। परिणाम यह होता है कि कुछ दिनों बाद ही पौधे सूख जाते हैं। शहर और उसके आसपास के इलाकों में पिछले वर्षों में लगाए गए पौधों का यही हश्र हुआ है।
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