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होली की ठिठोली 18-22-34

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ताजपुर डेहमा। होली का त्योंहार नजदीक आता जा रहा है। बावजूद इसके गांवों में ढोलक की थाप एवं झाल, मंजीरे पर फगुआ के गीत सुनाई नहीं दे रहे हैं। पहले फागुन माह में दिन ढलते ही गांवों की गलियों में हारमोनियम झाल -मंजीरें तथा ढोलक की थाप से गूंजने लगती थी। बोलो सा रा... रा... रा... के बोल के साथ ही जोगीरा तीन ताल, चौ ताल, फाग होरी आदि गीत फिजाओं में तैरने लगते थे। गांवों में कई जगहों पर इन गीतों के आयोजन होते थे जिसमें ग्रामिणों की भारी भीड़ एकत्रित होती थी । अपने सहन व दलानों में इस प्रकार का आयोजन करना शान की बात समझी जाती थी। सामूहिक रूप से भांग तथा गुड़ का सेवन कर गीत गाए जाते थे । परिवर्तन के इस दौर में इस परम्परा ने दम तोड़ दिया है ।अब गांवों में न तो झाल बजते है और न ही ढोलक की धम धम।
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गांव के हृदय नारायण राय का कहना है कि हम बचपन में कई कई दिन तक रंगीन ही रहते थे। न खाने की सुध न सोने की। बस होली आते ही एक दूसरे के साथ फगुआ गाना, मस्ती लेना और रंग डालना। लोगों में एक दूसरे के प्रति सम्मान औऱ भाई चारा था। इस त्योहार के प्रति एक अलग ही जोश खरोश दिखाई देती थी । उन्होंने बताया कि बसंत पंचमी और शिवरात से ही लोगों पर फगुआ चढ़ जाता था। होली का मिजाज बनने लगता। जगह -जगह फाग गीत के साथ लोक गीत , लोक नृत्य का आयोजन प्रतिस्पर्धा के रुप में महिनों तक चलता। इसी क्रम में बुजुर्ग महेंद्र राय तो आज भी अपने जमाने की होली को याद कर जवान हो उठते है। फाग के गीत गाने लगते है। संवत जलावन से लेकर कब होली बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। मिल जुल कर चन्दे आदि वसूल कर लकड़ी जुटा कर होलिका बनाते. इस बीत कई लोगों को चिढ़ाते भी थे और होलिका जलते ही जैसे सभी जोगीरा की धुन में रम जाते। देर तक फाग गाया जाता। रात हो जाती थी। कुच मनबढ़ महिलाएं रात को भी रंग तथा पानी फेंक कर देवर भौजाई के रंग को जमाती। अब इस त्यौहार की औपचारिकता भी ही रह गयी हैं। लोगों की व्यस्तता और आपसी होड़ ने होली की मिठास को कम कर दिया है।
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