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सच्चे इस्लाम में तो हिंसा की गुंजाइश ही नहीं

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गाजीपुर/बारा। शहर स्थित मदरसा दारुल उलूम कादीरिया के परिसर में सोमवार की रात सरकारें मदीना कांफ्रेंस एवं उर्से मुकद्दस का आयोजन किया गया। इस दौरान ओलमाओं ने मजहब-ए-इस्लाम के खूबियों पर विस्तृत प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि इस्लाम अमन और शांति का संदेश देने वाला मजहब है। इसमें हिंसा की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है।
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इस क्रम में बाहर से आए शायरों ने एक से बढ़ कर एक नाते पाक पेश किए, जिसे सुन कर अकीदतमंद झूम उठे। मुख्य वक्ता मौलाना संभल मुरादाबाद से आए सय्यद शबाहत हुसैन ने कहा कि कलाम ए -पाक अल्लाह (ईश्वर) की आखिरी आसमानी किताब है। इसके बाद दुनिया में कोई दूसरी आसमानी किताब नहीं आने वाली। इस किताब के आने से पूर्व जितनी भी आसमानी किताबें आई हैं, चाहे वह तौरेत हो, जब्बूर या इन्जील हो या फिर वेद, पुराण अथवा उपनिषद। सभी में एक अल्लाह या एक माबूद ए हकीकी की प्रार्थना करने का संदेश दिया गया है।
इस दौरान विशिष्ट वक्ता नेपाल के मौलाना मोहम्मद इब्राहीम रजा चतुर्वेदी ने कहा कि नमाज इंसान को हर बुराई से दूर रखती है। नमाज अल्लाह के रसूल की आंखों की ठंडक है। यह अल्लाह की कुर्बती तथा खुशनोदी हासिल करने का जरिया है। औरतों के लिए पर्दे का जिक्र करते हुए कहा कि इस्लाम ने औरतों के लिए पर्दा बेहद जरूरी करार दिया गया है, ताकि किसी गैर मर्द की नजर उसके जिस्म को न टटोल सके और भारतीय संस्कृति में भी औरतों के लिए पर्दे का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके बाद बाहरी शायरों ने नाते पाक पेश किया। प्रोग्राम की शुरूआत कारी तय्यब अली बांद्वी के तलावते कलाम ए पाक से हुआ। जलसे की सदारत कारी काजी शाह फरीद अख्तर, कयादत (अगुवाई) कारी काजी शाह सय्यद मोहम्मद अकमल कादरी ने और संचालन मौलाना आसिफ रजा सैफी ने किया। इससे पूर्व दोपहर बाद ख़त्म बुखारी और सायं छह बजे चादर पोशी की गई। आयोजकों ने जरूरतमंदों में कंबल भी बांटा।
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