गाजीपुर। अच्छे फसल उत्पादन में उन्नत किस्मों का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। क्षेत्र की पारिस्थितिक, जलवायु, खेतों की मृदा एवं सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर रोग प्रतिरोधी धान की प्रजातियों का चयन करना चाहिए। बीजों को हमेशा किसी विश्वसनीय मान्यता प्राप्त संस्थान से ही खरीदना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक ओमकार सिंह ने बताया कि एक बार प्रमाणित बीज लेने के बाद उसे तीन वर्ष तक बदलने की आवश्यकता नहीं होती है।
उन्होंने कहा कि अगर किसान अपना बीज बुआई के लिए प्रयोग कर रहे हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बीज का अंकुरण 80-90 प्रतिशत तक हो। बुआई से पूर्व स्वस्थ बीजों की छंटनी कर लेनी चाहिए। इसके लिए दो किग्रा नमक को 20 किग्रा पानी में घोल मिलाकर तीन किग्रा बीज डालकर छोड़ देना चाहिए। कुछ देर बाद स्वस्थ तथा भारी बीज नीचे बैठ जाते हैं और हल्के तथा थोथे बीज ऊपर तैरने लगते हैं। धान लगाने से पूर्व उसकी नर्सरी का प्रबंधन अति आवश्यक होता है। बताया कि प्रजातियों के अनुसार उनकी बोने की तिथि तथा बीज दर भी अलग-अलग होती है। मध्यम अवधि वाले बीजों को बोने की तिथि 25 मई से 30 मई, कम अवधि वाले 15 से 30 जून, महीन धान की बीज की मात्रा 30 किलोग्राम, मध्यम 35 किलोग्राम, मोटा 45 से 50 किलोग्राम तथा संकर प्रजाति 15 से 18 किलोग्राम होती है। बीजों को बोने से पहले उसका उपचारण भी बहुत जरूरी होता है जिससे पौधों में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है। फफूंद और जीवाणु दवाओं के घोल से बीज का उपचार करने से बीज द्वारा फैलने वाली बीमारियां नियंत्रित रहती हैं। बीजों को ट्राइकोडर्मा से 10 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से भी उपचारित किया जा सकता है। बीज उपचारित करने से विभिन्न प्रकार के फफूंद तथा जीवाणु जनित रोग जैसे की जड़गलन, झुलसा रोग तथा पत्ती झुलसा रोग आदि बीमारियों के नियंत्रण में सहायता मिलती है।