गाजीपुर। शहर सहित जनपद के मुस्लिम बहुल गांव में हजरत मुहम्मद स. के नवासे हजरत इमाम हुसैन एवं अन्य शोहदाए करबला की शहादत का गम मनाया जा रहा है। मुस्लिम समुदाय विषेश कर शिया समुदाय के लोगों ने गम के प्रतीक काले लिवास धारण कर लिए हैं। अजाखानों में फर्शे अजा बिछाई जा रही है। अजा खानों में ताजिया के साथ ही अलम, ताबूत, झूला आदि की शबीहें रखकर उसे सजाने-संवारने का काम चल रहा है। मजलिसों-मातम नौहाख्वानी की जा रही है। जुलूस निकाले जा रहे हैं। इस दौरान अकीदतमंद या अली या हुसैन या अब्बास की सदाएं बुलंद कर रहे हैं।
हजरत मुहम्मद स. के नाती व हजरत अली और फातिमा के बेटे इमाम हुसैन की शहादत विश्व प्रसिद्ध है। ये ऐसे योद्धा थे, जो जाहिरी तौर पर लड़कर शहीद हो गए। इनका सर कलम हो गया, घर उजड़ गया, खैमे जला दिए गए, औरतो को नंगेसर बाजारों में घूमाया गया। बावजूद इसके इमाम आली मकाम अपने मकसद में कामयाब हो गए। यजीद एवं उसके साथियों ने इमाम एवं उनके साथियों को शहीद तो कर दिया, लेकिन आज उसको मानने वाला या उसका नाम लेवा कोई नहीं जब कि आज विश्व में इमाम हुसैन में अकीदा रखने वाले असंख्य है। इमाम ने शहादत स्वीकार की, लेकिन यजीद के राहो पर चलना स्वीकार नही किया, जिसने इस्लाम की तस्वीर ही उलट दी थी। कर्बला ऐसी दर्सगाह है, जहां से हमें इंसानियत का दर्स मिलता है। इमाम की निगाह में स्वयं, अपने साथियों, अजीजों और बच्चों की जिंदगी से ज्यादा इंसानियत के उसूल थे। आपने मानवीय मूल्यों को कभी भी अपने से दूर नही जाने दिया। सच्चाई के लिए उन्होने जानबूझ कर कुर्बानियां दी। इस्लाम बचाने के लिए इमाम ने वतन छोड़ा और मुहर्रम की दूसरी तारिख को हुसैनी काफिला कर्बला पहुंचा। नहरे फोरात के किनारे हुसैन रजी के खैमे स्थापित हो गए। कुछ दूरी पर यजीदी फौज ने अपना खैमा डाल दिया। इमाम ने कर्बला की बंजर जमीन कबीला बनी असद के लोगो से खरीदा फिर वह जमीन उन्ही लोगों को इस शर्त पर अतिया कर दिया कि शहादत के बाद हमारी लाशों को दफ्न कर देना। तीन मुहर्रम को यजीदी फौज के हुक्म से दरिया के तराई से खैमे हटाकर तपते सहरा में लगा दिए गए। चार और पांच मुहर्रम को यजीदी फौज के लश्कर के लश्कर जमा हुए, जो 30 हजार के आस पास बताई जाती है। 7 मुहर्रम को इमाम और उनके साथियों पर पानी बंद कर दिया गया, नहरे फोरात पर यजीद के हुक्म से पहरे लगा दिए गए। तीन दिन भूखा-प्यासा रहते हुए दस मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके अन्य साथी शहीद कर दिए गए। इन्ही शहीदों का गम मुहर्रम के महीने में मनाया जाता है। मजलिसों में शोहदाए कर्बला के मसाएब बयान किए जा रहे हैं, जिन्हें सुनकर अकीदतमंद अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक पा रहे हैं।