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डिप्रेशन को कम करने में रामबाण है भ्रामरी प्राणायाम

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गाजीपुर। सुहवल इंटर कालेज के परिसर में पतंजलि योगपीठ के बैनर तले नि:शुल्क योगाभ्यास शिविर जारी है। सोमवार को योगाचार्य अमित पांडेय और पवन यादव ने भ्रामरी प्राणायाम के बारे में बताया कि भ्रामरी शब्द की उत्पत्ति ‘भ्रमर’ से हुई है, जिसका अर्थ होता है गुनगुनाने वाली काली मधुमक्खी। इस प्राणायाम का अभ्यास करते समय साधक नासिका से गुनगुनाने वाली ध्वनि उत्पन्न करता है। डिप्रेशन कम करने के लिए ये रामबाण है।
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उन्होंने बताया कि घेरंड संहिता में भ्रामरी को दोनों हाथों से दोनों कानों को बंद कर श्वास लेने और रोकने के रूप में बताया गया है। प्राणायाम के प्रतिदिन अभ्यास से साधक को दाहिने कान में विभिन्न प्रकार की ध्वनि सुनाई देती है। जैसे झींगुर की आवाज, बांसुरी, बिजली, ढोल, भौंरा, घड़ी घंट, तुरही आदि। सबसे अंत में हृदय से उठती हुई अनहत की ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस ध्वनि के मिश्रण से एक आंतरिक प्रकाश पुंज उठता है। उस प्रकाश पुंज में मस्तिष्क विलुप्त हो जाता है और योग के उच्चतम शिखर को प्राप्त करता है, जिसे परमपद कहा जाता है। भ्रामरी प्राणायाम दिन में तीन बार किया जाना चाहिए। योगाचार्यों ने कहा कि हठ प्रदीपिका के अनुसार भ्रामरी में पुरक के दौरान भ्रंगनाद (नर मधुमक्खी की ध्वनि) और रेचक के दौरान भृंगीनाद (मादा मधुमक्खी की ध्वनि) उत्पन्न होती है। सबसे पहले पद्मासन या सिद्धासन या किसी भी आरामदायक अवस्था में बैठें और आंखें बंद कर लें। मुंह बंद रखें और गहरी श्वांस लें। श्वांस छोड़ते समय मधुर गुनगुनाने वाली ध्वनि करें। दोनों कानों को अंगूठों से बंद कर लें और मधुमक्खी के गुनगुनाने की ध्वनि के साथ श्वांस छोड़ें। अमित पांडेय एवं पवन यादव ने बताया कि भ्रामरी प्राणायाम के बहुत सारे फायदे हैं। ये मस्तिष्क को प्रसन्न एवं शांत रखने के साथ तनाव और घबराहट से राहत दिलाता है।
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