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शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है रुद्राभिषेक करना

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जखनिया। सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर श्रावण माह के पहले दिन से ही चातुर्मास महायज्ञ का आयोजन चल रहा है। इस दौरान प्रतिदिन पार्थिव (मिटटी) शिवलिंग बनाकर वैदिक विद्वानों द्वारा विधि-विधान से रुद्राभिषेक के साथ ही ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा महामृत्युंजय जप निरंतर किया जा रहा है। इसके साथ ही महामण्डलेश्वर भवानीनंदन यति जी द्वारा हरिहरात्मक पूजन एवं उत्तर पूजन किया जा रहा है। इस अवसर पर प्रवचन करते हुए स्वामी भवानीनंदन यति महाराज ने कहा कि रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। शास्त्रों में भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना जाता है। रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में किया गया है। उन्होंने भगवान रुद्र (शिव) के अभिषेक का पौराणिक एवं वैदिक महत्व बताते हुए कहा कि रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र का अभिषेक यानि कि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान भगवान मृत्युंजय शिव को कराया जाता है। अभिषेक को आजकल रुद्राभिषेक के रुप में ही ज्यादातर जाना जाता है। अभिषेक के कई प्रकार तथा रुप होते हैं। ज्योतिषाचार्य के मुताबिक रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दुखों का कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पटक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का आशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है। लगातार दो माह तक चलने वाले इस चातुर्मास महायज्ञ में दर्शन-पूजन के निमित्त देश के कोने-कोने से शिष्य-श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा हुआ है। भक्तों द्वारा रुद्राभिषेक पूजन में यजमान बनकर पुण्यार्जन किया जा रहा है।
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