गाजियाबाद। 35 लाख की आबादी का जिला गाजियाबाद, एक बर्न वार्ड और वो भी बंद। एमएमजी अस्पताल के बर्न वार्ड पर अफसरों ने यह कहते हुए ताले जड़वा रखे हैं कि उनके पास मरीजों की देखभाल को स्टाफ ही नहीं। बर्न वार्ड बंद है तो बर्न पैशेंट्स भी अस्पताल में दाखिल नहीं किए जा रहे। हल्के मामले बाहर के बाहर निपटाए जा रहे हैं और गंभीर मरीजों को यूं ही बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
जीते जी किसी का शरीर यदि आग की चपेट में आ जाए तो उसकी हालत देखकर दूसरों का भी कलेजा कांपता है। और ऐसे में यदि किसी बर्न पेशेंट को वक्त पर इलाज भी न मिले तो उसकी पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। सरकार ने कई साल पहले गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल में लाखों रुपये खर्च कर बर्न वार्ड तैयार कराया था मगर काफी समय से इसमें मरीज भर्ती ही नहीं किए जा रहे। कहने को महानगर के अंदर दो-दो जिला स्तरीय अस्पताल हैं मगर बर्न रोगियों का इलाज कहीं होता नहीं दिख रहा। डाक्टर बर्न के हल्के केस जरूरी देख रहे हैं मगर बर्न वार्ड बंद होने से गंभीर मरीजों से पल्ला झाड़ा जा रहा है। ज्यादा हायतौबा मचने पर जिस किसी मरीज को अस्पताल के दूसरे किसी वार्ड में रखा भी जा रहा है मगर वहां सिवाय नरक के उसे कुछ नसीब नहीं हो रहा। अब दीपावली करीब आ रही है। हर साल ऐसे समय में बर्न मामले ज्यादा आते हैं। जब एमएमजी में वार्ड ही बंद पड़ा है तो ऐसे मरीजों का इलाज कहां होगा, इसका जवाब अफसरों के पास नहीं।
बर्न वार्ड ही क्यों
बर्न वार्ड के इंतजाम आग की चपेट में आग मरीजों के हिसाब से होते हैं। मरीज को संक्रमण से बचाने को उसे वातानुकूलित रखा जाता है। संक्रमण के खतरे को देखते हुए ऐसे वार्ड में बाहर के लोगों की एंट्री पूरी तरह से बंद रहती है।
लाखों रुपये बर्बाद
एमएमजी का बर्न वार्ड 2006-07 में 16 लाख की लागत से तैयार कराया गया था। दस बेड का वार्ड तो बन गया मगर इसके लिए अलग से स्टाफ नहीं नियुक्त हुआ। पहले अस्पताल वाले दूसरे विभागों का स्टाफ लगाकर इसमें मरीजों की देखरेख कराते थे मगर अब वे ऐसा भी नहीं कर रहे।
कुष्ठ वार्ड भी बीमार
कुष्ठ रोग विभाग भी स्टाफ की कमी से बंद पड़ा है। करीब सौ 60 बेड केकुष्ठ रोग वार्ड में मरीजों को भर्ती ही नही किया जाता क्योंकि वहां स्टाफ की कमी।
बर्न वार्ड के लिए अस्पताल में स्टाफ ही नहीं है। बार-बार शासन से डिमांड कर रहे हैं। पूरे अस्पताल में 63 पदों पर सिर्फ 15 का स्टाफ काम कर रहा है। ऐसे में बर्न वार्ड को बंद रखना हमारी मजबूरी है। - अमलेश वर्मा , सीएमएस एमएमजी