बुंदेलखंड की सीमा से जुड़ी घाटमपुर तहसील के 50 से अधिक गांवों के निवासी जल संकट से गुजर रहे हैं। अप्रैल के प्रथम सप्ताह में ही 80 फीसदी हैंडपंप जवाब दे गए हैं। अधिकांश जलाशयों में फरवरी के महीने में ही धूल उड़ने लगी थी। जबकि, तापमान बढ़ने से धरती के सीने में दरारें फटनी शुरू हो गई हैं। मवेशी भूख से व्याकुल होकर तालाबों की तली में चारे की तलाश कर रहे हैं।
मुगल रोड के दक्षिण छोर में बसे गांव तिरहर इलाका कहलाते हैं। गेटवे आफ बुंदेलखंड के रूप में तहसील के कानपुर देहात जिले की सीमा पर अमिरतेपुर और गड़ाथा से लेकर फतेहपुर जनपद की सीमा पर बसे समुही-भटपुरवा तक करीब 30 गांवों में फरवरी-मार्च के महीनों में ही पेयजल संकट सिर उठाने लगता है। जबकि, मई-जून के महीनों में हालत काफी बदतर हो जाते हैं।
भटपुरवा गांव के किसान रमेशचंद्र प्रजापति, गड़ाथा गांव निवासी राजू द्विेदी, टिकरी-गौरवा निवासी पुष्पेंद्र सिंह और कोटरा-मकरंदपुर गांव निवासी एडवोकेट हरनाथ सिंह परमार ने बताया कि बीते तीन वर्षों से इस इलाके के लोग प्रकृति की मार से जूझ रहे हैं। लेकिन, इस बार मानसूनी वर्षा काफी कम होने से अकाल के हालात हैं। हजारों बीघे खेत परती पड़ जाने से आदमियों के लिए आनाज तो मवेशियों के लिए चारे का संकट मुंह बाए खड़ा है।
पेयजल संकट पर बताया कि जो हैंडपंप पानी दे रहे हैं उनमें भोर से लेकर देररात तक लोग घड़े-बाल्टी लेकर पानी भरने के लिए लाइन लगाए रहते हैं। बताया कि किसी भी गांव के तालाब में पानी नहीं बचा है जिससे मवेशियों के पानी पिलाने की समस्या है। इधर रेउना, पतारा, तेजपुर, पासीखेड़ा, उमरी, तिवारीपुर, सजेती, श्रीनगर, नवेड़ी, पतरसा, स्योंढ़ारी, तिलसड़ा, बलहापारा, रायपुर, ओरिया, किवड़िया, बरौली, कोरियां, बावन और बरीपाल सहित कई गांवों में तालाब सूखे होने से भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे चला गया है। जिससे हैंडपंप और नलकूप सभी जवाब दे रहे हैं।
सूखे तालाबों को भराने के लिए प्रशासन स्तर से कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। किसानों की मांग और धरना-प्रदर्शन के बाद नहरों में पानी छोड़ा गया है। लेकिन, अभी रजबहों के अंतिम छोर तक न पहुंच पाने से 80 फीसदी गांवों के तालाब सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों ने बताया कि जिन गांवों में नहर के पानी से तालाब भराने की व्यवस्था नहीं है। वहां पर प्रशासन को राजकीय और निजी नलकूपों से तालाब भराने की व्यवस्था करवानी चाहिए।