सुहागनगरी के साख पर प्रदूषण का बट्टा
दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में जिले का भी नाम
सड़कों से उड़ने वाली धूल, जेनरेटर और धूआं उगल रहे वाहन ज्यादा जिम्मेदार
अमर उजाला ब्यूरो
फीरोजाबाद। सुहाग के प्रतीक रंग बिरंगी चूड़ियों और कांच उत्पादों के लिए विश्व विख्यात सुहागनगरी की साख को बढ़ते प्रदूषण ने प्रभावित किया है। प्रदूषण को रोकने के लिए भले ही करोड़ों रुपये खर्च किए गए हों लेकिन नतीजा शून्य रहा। यही नहीं कोयले से संचालित सैकड़ों कारखाने बंद हो गए लेकिन शहर की आवोहवा में घुले प्रदूषण का मानक कम नहीं हो सका। फीरोजाबाद उन चुनिंदा शहरों में शामिल है जो सबसे अधिक प्रदूषित हैं।
फीरोजाबाद के परंपरागत कांच उद्योग का संचालन वर्षों पूर्व कोयले से होता था। ताज ट्रिपेजियम जोन बनने के बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर वर्ष 1996 में टीटीजेड में कोयले का प्रयोग पूर्णतया प्रतिबंधित कर दिया गया। इससे पूर्व में जहां 400-500 इकाइयाें का संचालन होता था वह क्लीन फ्यूल गैस मिलने के बाद करीब दो सौ ही रह गईं। बावजूद ग्रीन गैस से कांच इकाइयों का संचालन होने के बाद भी प्रदूषण का ग्राफ कम होने के बजाए बढ़ता जा रहा है। सुहागनगरी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर देश के बड़े औद्योगिक संगठनों, एनजीओ द्वारा लगातार शिकायतें की जा रही हैं। एनजीटी के निर्देश पर नवंबर-15 में टीटीजेड अथॉरिटी, नेशनल इनवायरमेंट एंड फारेस्ट एंड जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त टीम द्वारा फीरोजाबाद के राजा का ताल, मक्खनपुर, सीडीजीआई में तीन स्थानों पर आधुनिक उपकरणों को लगाकर प्रदूषण के आंकड़े एकत्रित किए थे। इसके बाद टीटीजेड अथॉरिटी के निर्देश पर जिला प्रशासन द्वारा नागपुर की संस्था नीरी से प्रदूषण के वास्तविक कारणों की जांच कराई गई, जिसमें 55 लाख रुपये खर्च किए गए। नीरी द्वारा सौंपी गई 125 से अधिक पेज की रिपोर्ट में बढ़ते प्रदूषण के लिए शहर में उड़ने वाली धूल के साथ बड़ी संख्या में चलने वाले जेनरेटर, पेट्रोल, डीजल से दौड़ने वाले वाहन भी जिम्मेदार हैं।
चार गुना से अधिक है आरएसपीएम का मानक
फिजां में मुख्यत: तीन तरह के प्रदूषण हैं। आरएसपीएम (स्वसनीय सूक्ष्म कण), एसओ टू (सल्फर डाई आक्साइड) तथा एनओ-टू (नाइट्रोजन आक्साइड)। इन तीनों प्रदूषणों में आरएसपीएम सबसे अधिक खतरनाक प्रदूषण माना जाता है। वर्तमान में आरएसपीएम का मानक चार गुने से अधिक है। हालांकि एसओ-टू व एनओ-टू मानक के अंदर है।
111 पकाई भट्ठियों पर लगी बंदी की मोहर
शहरी की घनी आबादी के बीच वर्षों से धुआं उगल रही 111 पकाई भट्ठियों पर जिला प्रशासन ने वर्ष 2014 में बंदी की मोहर लगा दी थी। पकाई भट्ठियां होने से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लाखों लोगों को राहत मिली। वहीं हजारों श्रमिक बेरोजगार हुए।
खत्म हुआ लस्टर चूड़ी का अस्तित्व
सुहागनगरी में दो दशक से एक दर्जन इकाइयों में लस्टर का प्रयोग किया जा रहा था। लस्टर के जलने से उत्पन्न खतरनाक किस्म के एसिडिक अवयव मानव शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक दायक थे। लस्टर लोहे को भी गला देता है। लस्टर प्रदूषण रोकने को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा सभी इकाइयों में डिवाइस लगवाई गई थीं, लेकिन शासन के निर्देश पर सभी इकाइयों से लस्टर का प्रयोग पूर्णतया बंद करा दिया।
बढ़ते प्रदूषण के लिए यह भी हैं जिम्मेदारी
- व्यापक पैमाने पर पालिथीन का प्रयोग होना।
- पेड़-पौधों की संख्या में लगातार गिरावट आना।
- शहर में क्षतिग्रस्त सड़कों से उड़ती धूल॥
- बड़े पैमाने पर डीजल व पेट्रोल वाहनों का दौड़ना।
- शहर के होटल, मैरिज होम, रिसोर्ट, स्कूल, कालेज व बाजार में धुआं उगल रहे जेनरेटर सेट।
प्रदूषण के आंकड़े एक नजर में
मानक वर्तमान
आरएसपीएम 60 251
एसओ-टू 20 9
एनओ-टू 30 35