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‘मन, वचन, काय की सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म’

Fri, 09 Sep 2016 01:05 AM IST
Amar Ujala
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‘मन, वचन, काय की सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म’ - फोटो : Amar Ujala
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संगीतमय पूजन के बाद धर्म सभाओं का हो रहा आयोजन
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अंताक्षरी एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता में समाज के लोग ले रहे भाग
दसलक्षण पर्व पर जैन मंदिरों में श्रद्धा एवं भक्ति का संगम नजर आ रहा है। गुरुवार का दिन जिनेंद्र देव की पूजा अर्चना से शुरू हुआ और रात्रि में उत्तम आर्जव व्रत की चर्चा की गई। मंदिरों में बाहर से आए विद्वानों ने उत्तम आर्जव का मर्म समझाया। वहीं, दोपहर में तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया। चंद्रप्रभु मंदिर में मुनि श्री विज्ञ सागर जी महाराज ने तत्वार्थसूत्र का विवेचना की। उन्होंने तीसरे अध्याय में अजीव तत्व की विवेचना की। उन्होंने स्वर्ग एवं नरक के परिमाण की जानकारी दी। बनारस यूनिवर्सिटी से आए डॉ. कमलेश जैन ने उत्तम आर्जव धर्म के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि धर्म का महत्व सभी जानते हैं, लेकिन इतने दिनों में भूल जाने के कारण विद्वानों को याद दिलाने के लिए बुलाया जाता है। ज्यादा संग्रह न करें, धर्म के सहारे ही जीवन की नैया पार लगाई जा सक ती है। मंदिर में सुबह सामूहिक पूजन किया गया। विधानाचार्य राजेश जैन ने तत्वार्थसूत्र का वाचन किया। संचालन कुलदीप मित्तल जैन ने किया। वहीं, शीतलनाथ दिगंबर जैन मंदिर नया रसूलपुर में विद्वान विमल कुमार जैन और दीपक जैन के निर्देशन में पूजा अर्चना की गई। उन्होंने कहा कि मन वचन काय की सरलता ही आर्जव धर्म है। अपने को ऊंचा दिखाने का भाव माया है। इसके बाद अंताक्षरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। वहीं, छदामीलाल जैन मंदिर में आचार्य श्री विनम्र सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में संगीतमय पूजा का आयोजन किया गया। विभव नगर, नई बस्ती जैन मंदिर, नसियाजी मंदिर, अट्टावाला मंदिर, घेरगोखल, लोहियान गली स्थित मंदिर में भी धार्मिक कार्यक्रमों की धूम रही।

कमजोर लोग ही ज्यादा मायाचारी होते हैं : जैन मुनि
जैन मुनि विनम्र सागर महाराज ने कहा कि परमात्मा बच्चों को प्रेम, युवाओं को पुरुषार्थ और बूढ़ों को आराम देता है। बच्चों से ईश्वर ही नहीं सारी दुनिया प्रेम करती है। क्योंकि बच्चे निश्छल होते हैं। उनका दिल परमात्मा की तरह स्वच्छ होता है। छल कपट को वे नहीं जानते हैं। इसलिए बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है।
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छदामीलाल जैन मंदिर में मुनि महाराज ने कहा कि हर व्यक्ति अपने अवगुणों को छिपाना चाहता है। लेकिन वही अवगुण दूसरों में दिखें तो सबको चिल्ला, चिल्लाकर बताता है। सारी दुनिया के लोगों पर मायाजाल बिछा हुआ है। कमजोर लोग ही ज्यादा मायाचारी होते हैं, क्योंकि उनमें शक्ति का अभाव होता है। वो कार्य पूर्ण कराने के लिए छल-कपट का रास्ता अपनाते हैं। मुनि महाराज ने कहा कि जब तक हम अपने अंदर ईश्वर को प्राप्त नहीं करेंगे तब तक हमारे अंदर से छल, माया छोड़ने के विचार नहीं होंगे। धोखा देकर हम कितना कमा लें, लेकिन तुम्हारी कि स्मत में जितना लिखा होगा उतना ही धन ठहरेगा। शेष धन किसी परेशानी में चला जाएगा। ढोंगी लोगोें से ईश्वर प्रसन्न नहीं होते हैं।
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