फिरोजाबाद। नसियाजी मंदिर में प्रवासरत जैनमुनि बालयोगी अमित सागर के निर्देशन में डॉ. अमित जैन ने शोध किया कि लिपोग्राम यानी वर्णलोप लेखन अविष्कार भारत में हुआ था। दो हजार साल प्राचीन ग्रंथ तत्वार्थ सूत्र में जैन आचार्य उमास्वामी ने इस विधा का प्रयोग किया था। डॉ.जैन के शोध को बौद्धिक संपदा के तहत भारत सरकार से कॉपीराइट भी मिला है।
जैन मुनि अमित सागर ने कहा कि दुनिया में वर्णलोप को लेकर पूर्व में कभी शोध नहीं हुआ है। शोधार्थी डॉ.अमित जैन ने बताया कि इस पर शोध की प्रेरणा मुनि अमित सागर महाराज से मिली। कई ग्रंथों के अध्ययन के बाद में उन्होंने तत्वार्थ सूत्र में इसका अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि वर्णलोप भूल या स्वेच्छाचार्य का विषय नहीं है। लिपोग्राम ग्रंथ को प्रभावशाली बनाता है, क्योंकि उन वर्णों को छोड़ा जाता है जो व्यभिचार या आकर्षण पैदा करते हैं।
जैन आचार्य उमास्वामी ने तत्वार्थ सूत्र ग्रंथ में फ एवं झ वर्ण का पूरी तरह लोप कर दिया। संस्कृत ग्रंथ के दस अध्यायों के 357 सूत्र में अंत तक कहीं भी इस वर्ण का प्रयोग नहीं किया गया, क्योंकि झ नष्ट करने का संदेश देता है तो फ झंझट में फंसने का। तत्वार्थ शास्त्र में वर्णलोप की खोज को सरकार ने कॉपीराइट भी दिया है। इसके साथ में डॉ.जैन ने वर्णलोप के सिद्धांत की खोज करते हुए इसे त्रैविध सूत्र का नाम देते हुए इसे भारत की धरोहर बताया है।
डॉ.जैन ने कहा कि जैन धर्म आत्मतत्व एवं शास्त्रीय सिद्धांतों का अपूर्व स्त्रोत है। शब्दागम व्याकरण, तर्कागम-न्यायशास्त्र एवं परमागम सिद्धांत पर आधारित है, जो तत्वार्थ सूत्र में दिखाई देता है।