गर्मी में बढ़े समय से पहले प्रसव
- गर्भवती को डिहाइड्रेशन होने से बच्चे का पानी सूखने का बढ़ जाता खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी
फिरोजाबाद। भीषण गर्मी का प्रभाव गर्भवती महिलाओं पर भी पड़ रहा है। गर्मी में अनियमित खान-पान से होने वाले डिहाइड्रेशन का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर सबसे ज्यादा है। गर्भवती को अधिक डिहाइड्रेशन होने पर बच्चे का पानी सूखने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे समय से पूर्व प्रसव कराने पड़ सकते हैं। हर रोज ऐसे मामले सौ शैया अस्पताल और निजी नर्सिंग होम में सामने आ रहे हैं।
जिले में पिछले एक महीने से तापमान का प्रकोप अपने चरम पर है। गर्मी जनित बीमारियां तेजी से अपना पांव पसार रही हैं। उल्टी दस्त व डायरिया के लक्षण वाले मरीजों से अस्पताल भर गया है। सामान्य मरीजों को तो डिहाइड्रेशन होने पर हाई एंटीबायोटिक देकर जल्दी राहत मिल सकती है। लेकिन गर्भवती महिलाओं को एंटीबायोटिक न देने की स्थिति में डिहाइड्रेशन का उपचार करने में समय लग जाता है। उल्टी दस्त के कारण गर्भवती व उनके बच्चे में पानी की कमी होने लगती है। जिससे समय के पूर्व प्रसव कराने की जरूरत पड़ती है। महिला अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार पहले महीने में दो या तीन केस ही प्री- म्योचोर डिलवरी के आते थे, लेकिन अब हर रोज चार से पांच केस समय से पहले प्रसव कराने के मामले आ रहे हैं। इसी तरह प्राइवेट अस्पतालों में इस तरह के केसों की संख्या कई गुना ज्यादा है।
एसएनसीयू में बढ़ रहे नवजात शिशु
सौ शैय्या अस्पताल में एसएनसीयू में नवजात शिशु की संख्या बढ़ रही है। एक पलंग पर दो-दो नवजात शिशु भर्ती हैं। कभी-कभार स्थिति एक पर तीन भर्ती करने की आ जाती है। वहीं, शहर के चुनिंदा अस्पतालों में एसएनसीयू फुल चल रहे हैं। यहां से नवजात शिशुओं को आगरा रेफर किया जा रहा है।
- गर्भवती महिलाओं को गर्मियों में सेहत से प्रति अधिक सावधान रहने की जरूरत है। हर रोज चार से पांच लीटर पानी पिएं। बाहर का खाना तथा तला भुना खाने से खुद को बचाएं। यदि गर्भवती महिलाओं को डिहाइड्रेशन की समस्या होती है तो उन्हें रिकवर के लिए ओआरएस का घोल या ग्लूकोज दिया जा सकता है। गर्भवस्था में एंटीबायोटिक देना उचित नहीं होता।
डा. पूनम अग्रवाल, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं आईएमए अध्यक्ष
समय पूर्व जन्मे बच्चों का विकास ठीक नहीं हो पाता
मेडिकल कॉलेज के बालरोग विशेषज्ञ डॉ. एलके गुप्ता ने बताया कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं पाई गईं। इसकी वजह से बच्चे का विकास ठीक से नहीं हो पाता जो उनकी मृत्यु का कारण बन सकता है। साथ ही इसके चलते शिशुओं को जीवन भर स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। इसमें सांस, मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी समस्याएं शामिल हैं। ऐसे में इन मामलों में थोड़ी सी भी वृद्धि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।