सुहागनगरी के एक दर्जन लस्टर चूड़ी कारखानों को राहत मिलने के आसार नजर आ रहे हैं। बंदी की गाज से बचने को उद्यमियों ने कम प्रदूषण वाले केमिकल का प्रयोग करना शुरू कर दिया है, जिससे उन्हें राहत मिलती दिख रही है। सुहागनगरी में वर्षों से एक दर्जन इकाइयों में चूड़ी को सुंदर एवं कलात्मक बनाने को लस्टर का प्रयोग किया जा रहा है। लस्टर के जलने से उत्पन्न खतरनाक किस्म के एसिडिक अवयव मानव शरीर के लिए बेहद नुकसानदायक हैं। लस्टर के जलने पर निकलने वाली धुंध से व्यक्ति की आंखों पर खासा प्रभाव पड़ता है। टीटी जोन में शामिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदूषण पर सख्ती से रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके चलते करीब चार साल पूर्व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सभी एक दर्जन कारखानों में प्रदूषणरोधी यंत्र (डिवाइस) लगवाई गई थी। डिवाइस लगाने के बाद पीसीबी ने 40-50 फीसदी तक प्रदूषण नियंत्रण का दावा किया था लेकिन प्रदूषण कम नहीं हुआ। शासन तक शिकायत पहुंचने के बाद पीसीबी ने आनन-फानन में सभी इकाइयों को नोटिस जारी कर लस्टर का प्रयोग बंद करने के निर्देश जारी कर दिए। कुछ उद्यमियों द्वारा आईटीआई कानपुर के इंजीनियरों से प्रदूषण रोकने को नई डिवाइस बनवाने की कवायद चल रही है। इधर उद्यमियों ने प्रदूषण के मानक को घटाने के लिए काफी कम प्रदूषण वाले केमिकल का प्रयोग शुरू कर दिया है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लस्टर चूड़ी बनाने में पहले फैरी क्लोराइड केमिकल का प्रयोग किया जाता है, जिससे तीव्र प्रदूषण उठता है। श्रमिकों को कार्य करने में काफी परेशानी होती थी। इसके स्थान पर नए केमिकल फैरा क्लोराइड का प्रयोग शुरू किया है, जिससे प्रदूषण का मानक पहले की अपेक्षा काफी घटा है। वहीं श्रमिकों को भी कोई परेशानी नहीं हो रही।
लस्टर चूड़ी से जुड़े कुछ खास बिंदु
- दो दशक से अधिक सुहागनगरी में हो रहा लस्टर का प्रयोग
- चूड़ी में प्रयोग होने वाला केमिकल लस्टर शरीर के लिए काफी नुकसानदायक है
- सभी इकाइयों में 10-30 तक चलते हैं बेलन
- एक बेलन पर न्यूनतम 15 श्रमिक करते हैं कार्य
- प्रदूषण रोकने को पीसीबी ने लगवाई थीं डिवाइस
हमारा मुख्य उद्देश्य प्रदूषण को रोकना है, उद्योगों को बंद करना नहीं। यदि उद्यमी खुद ही प्रदूषण का मानक कम करने का प्रयास कर रहे हैं, तो उन्हें राहत देने पर विचार किया जा सकता है।
राजेंद्र प्रसाद, क्षेत्रीय अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड