उद्योग निदेशालय से अनुमति लिए बिना एनजीटी में पैरवी के लिए अधिवक्ता खड़े करने के मामले में उद्योग विभाग खुद ही फंसता नजर आ रहा है। उद्योग विभाग की ओर से पैरवी के मामले में अधिवक्ताओं ने पांच लाख से अधिक का बिल थमा दिया है। इसे अदा करने में निदेशालय के बाद टीटीजेड अथॉरिटी ने हाथ खड़े कर दिए हैं।
नई दिल्ली की सेफ संस्था की ओर से सुहागनगरी की 143 इकाइयाें के खिलाफ बढ़ते प्रदूषण, क्षमता विस्तार, इकाइयों को गलत रूप से संचालन की अनुमति देने सहित विभिन्न बिंदुओं पर एनजीटी में याचिका दाखिल की गई है। उद्योग विभाग में पूर्व में तैनात रहे उपायुक्त उद्योग द्वारा एनजीटी में पैरवी के लिए अधिवक्ताओं को खड़ा करने के संबंध में उद्योग निदेशालय से अनुमति तक नहीं ली गई। बाद में एक जमीन आवंटन के मामले में गड़बड़ी की शिकायत पर उनका स्थानांतरण हो गया। वर्तमान में आगरा के उपायुक्त उद्योग वीरेंद्र कुमार फिरोजाबाद का अतिरिक्त चार्ज देख रहे हैं। एनजीटी में पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं द्वारा जब पांच लाख से अधिक का बिल विभाग को थमाया गया तो अफसरों के होश उड़ गए कि आखिर इतनी धनराशि का भुगतान किस मद से किया जाए।
उद्योग विभाग ने अधिवक्ताओं के बिल का भुगतान कराने को पहले उद्योग निदेशालय पत्र भेजा। निदेशालय के इनकार के बाद टीटीजेड अथॉरिटी से गुहार लगाई गई कि किसी तरह भुगतान कर दिया जाए, परंतु टीटीजेड ने भी भुगतान करने से इनकार कर दिया है। अब उद्योग विभाग के अफसरों को समझ नहीं आ रहा है कि आखिर अधिवक्ताओं की फीस का कहां से भुगतान किया जाए?