फिरोजाबाद। चिकित्सकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा और पंजीकरण की जटिलताओं का है। यह ऐसा मुद्दा है जिसे अभी तक किसी सांसद ने अपने वादों में शामिल नहीं किया है। चिकित्सक चाहते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य से जुडे़ विषयों को लोकसभा का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार अपने घोषणा पत्र में शामिल करें। सिर्फ वोट मांगने के वक्त नहीं जीतने के बाद भी चिकित्सकों के बीच सांसद आएं। अमर उजाला द्वारा आयोजित फोकस ग्रुप में शामिल हुए शहर के प्रमुख चिकित्सकों और आईएमए से जुड़े पदाधिकारियों ने इसी तरह के कई मुद्दे उठाए
पंजीकरण की जटिलताएं खत्म की जाएं
चिकित्सक कानून की जटिलताओं से जूझ रहे हैं। चिकित्सकों के लिए हर साल सीएमओ के यहां से पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। प्रक्रिया इतनी जटिल है कि चिकित्सक परेशान हैं। कई स्थानों पर रिपोर्ट लगवानी होती है और सरकारी विभागों में काम कैसे होता है यह किसी से छिपा नहीं है। हमारी सांसद से अपेक्षा है कि लोकसभा में यह मुद्दा उठाएं और जटिल कानून खत्म कराएं। एक कानून ऐसा थोपा जा रहा है जिससे छोटी-छोटी क्लीनिक बंद हो जाएंगी।
डॉ. एसपीएस चौहान, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष आईएमए
चिकित्सकों को सुरक्षा की आवाज संसद में उठे
सांसद चिकित्सकों की सुरक्षा की आवाज संसद में उठाएं। मरीज का इलाज करते समय डाक्टर से अभद्रता नहीं होनी चाहिए। सांसद को स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर अपना एजेंडा जनता के सामने रखना चाहिए। बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी समस्याएं तो है ही। यह जिला उद्योग से जुड़ा है यहां के मजदूरों के स्वास्थ्य की दृष्टि से सांसद बहुत कुछ कर सकते हैं।
डॉ. उपेंद्र गर्ग, अध्यक्ष आईएमए
खाली पडे़ हैं स्वास्थ्य केंद्र डाक्टर भी दीजिए
शिक्षा और स्वास्थ्य बड़ा मुद्दा है। लोग शिक्षित होंगे तो स्वास्थ्य पर भी ध्यान देंगे। सरकार की योजनाओं पर गौर करें तो अस्पतालों के शानदार भवन बना दिए हैं और महंगे उपकरण भी लगा दिए हैं, लेकिन अस्पतालों में न डाक्टर हैं और न ही उपकरण चलाने वाले जानकार। देहात क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में भूसा भरा नजर आता है। जो भी सांसद चुना जाए वह अपने क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों की आवाज संसद में उठाए। सांसद राज्य सरकार को पत्र भी लिख सकता है।
डॉ. बीसी तिवारी, पूर्व सीएमएस फिरोजाबाद
स्वास्थ्य सेक्टर का बजट बढ़ाए सरकार
देखिए भारत को छोड़कर विश्व के कई मुख्य देशों में जीडीपी का छह प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। भारत में स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.4 प्रतिशत खर्च किया जाता है। हमारी मांग है कि स्वास्थ्य सेक्टर पर आंकडा 1.4 प्रतिशत से बढ़ाकर तीन प्रतिशत किया जाए। इससे देश को बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रेचर पर भी ध्यान देना चाहिए। पांच हजार की आबादी पर स्वास्थ्य केंद्र बनाने की बात हो रही है तब डाक्टरों की संख्या भी बढ़ानी होगी।
डॉ. आरबी शर्मा, चर्म रोग विशेषज्ञ
शहर पर भी ध्यान दें सांसद
भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहिए। स्थानीय स्तर पर देखा जाए तो सड़कों की जर्जर हालत है। जीतने के बाद सांसद अपने कुछ खास इलाकों पर की फोकस रखते हैं। जबकि शहर को नजर अंदाज किया जाता है। शहर में पूरे जिले के लोग आते हैं। जर्जर रास्तों से वाहन पलट जाते हैं। जाम भी लगता है। यह समस्याएं बेशक नगर निकाय स्तर की हैं, लेकिन ध्यान यह भी रखना होगा कि सांसद भी नगर निगम में पदेन सदस्य होते हैं।
डॉ. आरसी चौधरी, बाल योग विशेषज्ञ
अधिकारियों से मिलकर समस्याएं हल कराई जाएं
जीतने के बाद कोई कहां समस्याएं देखता है। शहर का ही हाल देख लीजिए। सड़कों की हालत जर्जर है। ट्रैफिक की अराजकता हरेक चौराहे पर देख सकते हैं। स्ट्रीट लाइटें खराब पड़ी हैं। सांसद तो पूरे जिले का प्रतिनिधि होता है। सांसद की भी जिम्मेदारी है जब भी शहर में आएं इन छोटी-छोटी समस्याओं से भी रूबरू हों और इनको डीएम या अन्य जिम्मेदार अधिकारी से मिल कर हल कराएं।
डॉ. अविनाश पालीवाल, बाल रोग विशेषज्ञ
डाक्टरों की सुरक्षा को कानून बने
चिकित्सकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का है। गंभीर मरीजों को देखने से डाक्टर इसलिए बचते हैं, क्योंकि कोई भी अनहोनी होने पर सीधे तौर पर डाक्टर को दोषी बता दिया जाता है। नर्सिंग होम, क्लीनिक पर तोड़फोडृ होती है। बिना जांच किए डाक्टर के खिलाफ ही मुकदमा लिख लिया जाता है। डाक्टरों की सुरक्षा के लिए कानून बने। सेंट्रल मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया जाए। यूपी में यह कानून प्रभावी बनाया जाए। इसमें आईपीसी की धाराएं जोड़ी जाएं।
डॉ. पंकज अग्रवाल, फिजिशियन
नशा मुक्ति केंद्र बनाया जाए
यह जिला मजदूर बहुल क्षेत्र है। यहां श्रमिकों के बीच स्वास्थ्य और स्वच्छता की अलख जगाना जरूरी है। अशिक्षा के कारण श्रमिकों के बीच बीमारियां अधिक फैल रही हैं। मजदूर शाम की कमाई का आधा हिस्सा नशाखोरी पर खर्च कर देता है। मजदूर अपने बच्चों को पढ़ाने की बजाए बालश्रम कराता है। इस जिले को जरूरत है नशा मुक्ति केंद्र की। इस जरूरत को सांसद पूरा कर सकते हैं। सरकार में प्रयास करके यहां नशा मुक्ति केंद्र खोला जाए।
डॉ. राधा मोहन गुप्ता, फिजिशियन
चिकित्सा के क्षेत्र पर भी सांसद निधि खर्च की जाए
सांसद निधि का प्रयोग चिकित्सा सुधार क्षेत्र में भी किया जाना चाहिए। एक सांसद की जिम्मेदारी है कि वह जानें कि किस तरह से स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी मदद दे सकते हैं। चिकित्सक मरीज को देखते समय हर पल स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं। डाक्टरों की सुरक्षा का विषय किसी सांसद ने जीतने के बाद नहीं उठाया है।
डॉ. नीरज गुप्ता, फिजिशियन
राष्ट्र से ऊपर कोई नहीं
सांसद का चुनाव यह देखकर तय होता है, जिसे हम चुनकर भेज रहे हैं वह संसद में किस तरह हमारी समस्या उठाएगा। देश की संसद पूरे देश की नीति और दिशा तय करती है इसलिए हम राष्ट्रवाद के विषय को विस्मृत नहीं कर सकते है। मुद स्थानीय नहीं लेकिन कहना जरूरी है कि भारत एक मात्र ऐसा देश है जहां कुछ ताकतें राष्ट्रगान और राष्ट्रीय झंडे का अपमान करती हैं। फिर हम सबकी जिम्मेदारी क्या है यह सोचना भी चुनाव के परिप्रेक्ष्य में जरूरी है।
डॉ. विवेक अग्रवाल, बाल रोग विशेषज्ञ
मंथन के मोती
- पंजीकरण प्रक्रिया काफी कठिन है इसे खत्म किया जाए
- डाक्टरों की सुरक्षा के लिए सेंट्रल मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट बने
- श्रमिकों को ध्यान में रखते हुए नशा मुक्ति केंद्र बने
- जीतने के बाद भी डाक्टरों के बीच आते रहें सांसद
- स्वास्थ्य सेक्टर का बजट बढ़ाए सरकार
- बुनियादी समस्याओं पर भी ध्यान दें जीतने वाले सांसद
- खाली पडे़ हैं स्वास्थ्य केंद्र, डाक्टर तैनात किए जाएं