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Fatehpur News: चार महीने के बाद आया दूसरे पक्ष का फैसला

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फतेहपुर। वर्ष 2008 में पट्टीशाह गांव में हुए चर्चित दोहरे हत्याकांड में बृहस्पतिवार को अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने के बाद क्षेत्र में चार माह पहले आए दूसरे फैसले की भी चर्चा रही। इससे पहले 20 फरवरी को शरीफ सेठ के भाई नफीस अहमद हत्याकांड में अदालत ने पूर्व प्रधान मज्जू मियां के चार पुत्रों समेत 12 अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। दोनों मामलों में अलग-अलग पक्षों के खिलाफ आए फैसलों को लोग न्यायिक संतुलन के रूप में देख रहे हैं।
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दोहरे हत्याकांड में दोषी करार दिए गए शरीफ सेठ पक्ष का आरोप था कि उनके भाई नफीस अहमद मुंबई से लौटकर मामले की पैरवी कर रहे थे। पूर्व प्रधान मजहर हैदर नकवी उर्फ मज्जू मियां को यह बात नागवार गुजरती थी। 24 नवंबर 2009 की शाम करीब चार बजे शरीफ सेठ भाई नफीस अहमद के साथ बुलेट से शाहपुर से गांव लौट रहे थे। उनके साथ गांव के अशोक और मुन्नू दूसरी बाइक पर सवार थे।
गांव के पास पहुंचते ही हमलावरों ने शरीफ सेठ और नफीस अहमद पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। गोली लगने से घायल शरीफ सेठ किसी तरह घर में घुसकर बच गए। नफीस अहमद बाइक के नीचे गिर गए। हमलावरों ने उन पर लगातार गोलियां चलाईं। जिला अस्पताल में चिकित्सक ने नफीस को मृत घोषित कर दिया था। शरीफ सेठ कानपुर में उपचार के बाद बच गए थे।
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इस मामले में नफीस की पत्नी सैयदा बेगम की तहरीर पर पट्टीशाह गांव के पूर्व प्रधान मजहर हैदर उर्फ मज्जू मियां, उनके बेटे सलमान, सीमाब नकवी, सिकंदर, भांजे मसरूर, मोबीन, अमीन, गय्यूर, फरहान हैदर उर्फ बासू, भाई शाहिद रजा, चंद्रभूषण यादव, रमेश यादव, खरगूपुर बरगला निवासी नसीम घोषी, रुकनुद्दीन, अकबरपुर चौराई निवासी तेग अली, सगीर, नरौली गांव के मो. अब्दुल हई, दंदवां के अख्तर हुसैन और सुल्तानपुर घोष गांव के असगर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था।
मुकदमे के दौरान पूर्व प्रधान मजहर हैदर नकवी उर्फ मज्जू मियां, अमीन, तेग अली, सगीर, चंद्रभूषण यादव और नसीम घोषी की मौत हो गई। वहीं अख्तर हुसैन के नाबालिग होने के कारण उसका मामला किशोर न्यायालय में चला गया। एक अन्य अभियुक्त का नाम विवेचना के दौरान प्रकाश में आया था।
मामले में 12 गवाहों की गवाही और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने 20 फरवरी को अंतिम सुनवाई के बाद सलमान, सिकंदर, सीमाब नकवी, शाहिद रजा, मोबीन, गय्यूर, मसरूर, फरहान उर्फ बासू, असगर, रुकनुद्दीन, रमेश चंद्र और मो. अब्दुल हई को आजीवन कारावास और 34-34 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी।
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