शीतला सप्तमी/ अष्टमी पर शुक्रवार को भक्तों ने माता रानी की चौखट पर श्रद्धा के शीश झुका करके परिवार के सुखमय रहने की मनोकामना मांगी। पौराणिक देवी स्थल शीतला मंदिर मेें सुबह से देर शाम तक आस्थावानों का जमघट लगा रहा। मंदिर में हुए भंडारा के प्रसाद को चखने के लिए लंबी लाइनों की प्रतीक्षा होती रही।
होली के सात या आठ दिन बाद शीतला की पूजा दैवीय शक्ति का आभार जताने का एक विधान मानी गई है। होली के बाद सप्तमी और अष्टमी के बीच पड़ने वाली रात को भोग तैयार करके तड़के शीतला माता की पूजा की जाती है।
शीतला को देवी दुर्गा का ही रूप माना गया है। शीतला सप्तमी या अष्टमी का नाम बसौड़ा भी है क्योंकि बासी गई रात बनाए गए व्यजंनों से पूजा अर्चना की जाती है
शहर के तुराबली पुरवा स्थित इस पौराणिक देवीधाम मेें भोर होते ही घंटे-घड़ियाल व शंखनाद गूंजने लगा। सूरज की पौ फटने से ही पहले पूजा अर्चना के लिए देवीभक्त परिवार समेत घरों से सिद्धपीठ चल पड़े।
धूप-लोबान व अगरबत्ती की फैल रही खुश्बू के बीच भक्ताें ने परिवार की सुख समृद्धि के लिए मां शीतला से मन्नतें मांगीं।
मंदिर समिति की ओर से आयोजित भंडारा के चालू होने से लेकर शाम तक लाइनें लगीं रहीं। आस्था के शीश नवाने के बाद भक्त प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाते नजर आए।