संवाद न्यूज एजेंसी
अमौली।
यूं ही मां नहीं कहलाती है। उसमें बच्चों के लिए करुणा, संकट में शक्ति स्वरूपा बनकर हर तरीके से सहारा देने का माद्दा होता है। वह बच्चों के लिए हर संघर्ष से जूझकर निकलने की ताकत रखती हैं। ऐसी ही कुछ कहानी अमौली के विकास खंड के गांव नोनारा की किसान चौबी देवी की है, जिन्होंने संघर्षों से लड़कर अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दी, बल्कि उच्च पदों पर बैठाया।
चौबी देवी की शादी 1972 में नोनारा के किसान स्वर्गीय सूर्यपाल उत्तम के साथ हुई थी। अक्तूबर 1988 में बदमाशों ने पति सूर्यपाल की हत्या कर दी। इस घटना से चौबी देवी के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया। बड़ी बेटी माधुरी 9, दूसरी बेटी प्रेमा 7, बेटा जसवंत 5, दूसरा बेटा कुलदीप 2 की जिम्मेदारी से आंखों के सामने अंधेरा दिख रहा था। सबसे छोटी बेटी किरन का जन्म पिता की मौत के दो महीने बाद ही हुआ था। अपने मासूम बच्चों के लिए चौबी देवी ने अपने दर्द को ताकत बनाया। उन्होंने अपने चार बीघे खेत में खेती करना शुरू की। इसके साथ ही दस से पंद्रह बीघे खेत बटाई में लेकर खेती में जी तोड़ मेहनत करने लगीं।
उन्होंने अपने संघर्षों को याद करते हुए बताया नलकूप में 50 फीट नीचे रस्सा के सहारे उतरकर पटा को कंधे में रखकर फिर ऊपर चढ़ते। इसके बाद दोबारा नीचे पटा चढ़ाने उतरना पड़ता था। नलकूप में दो से चार बार 50 फीट नीचे जाना और ऊपर आना काफी मेहनत का काम होता था। इसके बाद नलकूप से सिंचाई करते थे। इस कड़ी मशक्कत के पीछे बच्चों को पढ़ाने का जो सपना संजोया था, उसे पूरा करना था। दो बेटियो की शादी व्यवसायी और छोटी बेटी की शादी कानपुर में भारतीय वायु सेना में कार्यरत युवक के साथ किया। छोटे बेटे कुलदीप ने बीएड के साथ डिप्लोमा किया और वर्तमान में विद्युत विभाग में तकनीशियन पद पर कार्यरत हैं। चौबी देवी के संघर्ष की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अभी सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक पांच मार्च 2023 को बीमारी के चलते पहले बड़ी बहू फिर अप्रैल माह में बड़े बेटे जसवंत की मौत हो गई। एक बार फिर दुखों का पहाड़ टूटा, लेकिन मां यूं ही मां नहीं कहलाती है। दादी पोता और पोती के लिए मां की भूमिका में है। पोती मांशी (14) और पोता प्रिंस (10) की जिम्मेदारी अपने कंधो में लेकर उसी ताकत के साथ खड़ी हैं।