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मां एक नाम नहीं बल्कि जिंदगी जीने का जरिया

Sun, 08 May 2016 12:51 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, फतेहपुर
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बच्चे से दुलार करती मां - फोटो : अमर उजाला
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करुणा, त्याग, दया, प्रेम, वात्सल्य, स्नेह... ऐसे ना जाने कितने शब्द मां के लिए बने हैं। मां जिंदगी के रिश्तों की वह अनमोल डोर है जिससे सारा परिवार एक सूत्र में पिरोया रहता है। यह मां ही है जो अपनों से मिले दर्द और गुनाह को एक पल में न सिर्फ माफ कर देती है बल्कि उन्हें अपने जेहन से बिसार भी देती है। तभी तो हम सपने देखते हैं और उन्हें साकार करने का काम मां करती है। यही वजह है कि इस मां के बारे में दुनिया में शब्द कम पड़ जाते है लेकिन उसकी महिमा कभी पूरी नहीं होती। मदर्स डे पर मां की महिमा का बखान करती एक रिपोर्ट।
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जिला विकलांग जन कल्याण अधिकारी डॉ. प्रीतिलता की नजरों में मां इबादत है, मां सफलता का मुकाम है। मां से बढ़ कर दुनिया में कोई भी नहीं। जालौन जिले के उरई के राजेंद्र नगर निवासी अधिवक्ता रामेश्वर दयाल राजपूत के घर में जन्मी प्रीति कहती हैं कि वह राजपूत घराने की हैं। उनका समाज बेटियों को तालीम देने में पीछे हटता रहा।

बेशक पिता वकालत के पेशे से जुड़े रहे लेकिन वह भी बेटी को कालेज भेजने में सामाजिक बंधनों के चलते पीछे हटते रहे। ऐसे में मां सावित्री देवी ने ही उन्हें मनाया और आगे आकर पढ़ाई की राह दिखाई। उन्होंने सीनियर प्रोफेसर बनने का ऑफर बेटियों को शिक्षित बनाने के नाम पर ठुकरा दिया।
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तीन बहनों में सबसे छोटी प्रीतिलता कहती है कि बड़ी बहन सीमा व मंझली बहन अनुपम डॉक्टर हैं। वह खुद डॉक्टर रही हैं। आज वह खुश हैं कि सामने आने वाले निशक्तजनों की समस्याएं सुनती हैं और उन्हें संतुष्टि देती हैं। अपर जिला समाज कल्याण अधिकारी अनुसूचित जाति वित्त निगम मंजू देवी की सफलता मां मेें निहित है।

फैजाबाद में जन्मी मंजू कहती हैं वह गरीब परिवार में पली बढ़ी हैं। पिता रामचंद्र फल की छोटी सी गुमटी लगाकर आधा दर्जन सदस्यों का पालन पोषण करते थे। उनकी तमन्ना पढ़-लिख कर समाज सेवा करने की थी लेकिन इसके लिए शायद पिता के पास पैसे नहीं थे। इस घड़ी में मां शांती देवी ढाल बनकर खड़ी हुईं।

छलकती आंखों से 11 अप्रैल 1996 को दुनिया छोड़ने वाली इस मां का जिक्र करते हुए मंजू ने कहा कि उनका सपना था बिटिया अफसर बने। इसी को लेकर वह खुद उन्हें पढ़ाती थी ताकि ट्यूशन और नामचीन शिक्षण संस्थाओं की तालीम की कमी न खले। आखिर उस मां की मेहनत रंग लाई। आज जो कुछ भी हैं, मां की बदौलत हैं। सच कहूं तो मां एक नाम नहीं बल्कि जिंदगी जीने का जरिया है।

जिला महिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ के पद पर नियुक्त डॉ. शिवानी बाजपेई अपनी सफलता का सेहरा मां के सिर बांधती हैं। कानपुर नगर के घाटमपुर के किसान परिवार में जन्मी महिला चिकित्सक कहती हैं कि उनके पिता एसपी मिश्रा साधारण किसान हैं। मां शकुंतला मिश्रा घाटमपुर के सरकारी अस्पताल में स्टाफ नर्स के पद पर नियुक्त थीं।

मां के साथ वह भी अस्पताल जाती थीं। उन्हें काम करता देख कर एक दिन मां से अस्पताल कर्मी बनने की इच्छा जाहिर की। मां को बेटी की बात अच्छी लगी और उन्होंने उसी दिन संकल्प ले लिया कि वह इस बिटिया को अपने से बड़े ओहदे पर बैठाएंगी।

इसके बाद अस्पताल से लौटने के बाद वह उन्हें डॉक्टरी की बारीकियां यह कह कर समझाने लगीं कि अब वह तो डॉक्टर नहीं बन सकती हैं। हां उनकी बिटिया जरूर गले में आला डाल कर चले। फिर क्या था, मां का संकल्प और खुद की चाहत को साथ लेकर उन्होंने मां के सपनों को साकार किया। मां ने भी कदम-कदम पर साथ दिया। रिजल्ट आज सामने है।

जिला प्रोबेशन अधिकारी नीता अहिरवार की सफलता में भी वात्सल्य, दया और ममता की प्रतिमूर्ति का अहम योगदान है। शिक्षित बनने से लेकर समाज में मजबूती से स्थापित होने की विधा नीता ने अपनी मां गिरजा देवी से ही सीखी। जिला प्रोबेशन अधिकारी कहती है कि उनकी मां ने विपरीत परिस्थितियों से लड़कर सफलता दिलाई।

वह शुक्रगुजार हैं ऊपर वाले का, जिसने उन्हें ऐसी मां दी। 19 फरवरी 2011 को मां को खोने का गम सीने में दफन कर मौजूदा समय में समाज की विधवा और बेसहारा महिलाओं को इंसाफ दिलाने का काम करने वाली नीता का कहना है कि वह जब बीए कर रही थी तब मां को कैंसर हो गया था।

कैंसर पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने दवाएं खा-खाकर आगे बढ़ने का न सिर्फ रास्ता बताया बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए लगातार प्रेरित भी करती रहीं। बकौल नीता, संसार में मां का स्थान दूसरा कोई नहीं ले सकता है। वह हर तरह से अपने बच्चों के लिए जीती है और उनके भरण पोषण से लेकर उन्हें काबिल बनाने में अपना सर्वत्र न्योछावर करने से पीछे नहीं हटती है।
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