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गिरधर गोपाल न मिले तो मिट जाएगा शविराजपुर गांव का वजूद

Fri, 10 Apr 2015 12:31 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला फतेहपुर
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गंगा तटवर्ती शिवराजपुर का पुराणों में धर्म नगरी के रूप में उल्लेख है। यहां पूरे वर्ष श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई के हाथाें स्थापित गिरधर गोपाल के दर्शन को भक्त आते रहते हैं। भक्तों में इस बात को लेकर आक्रोश है कि मूर्ति चोरी की पहली घटना से पुलिस ने सबक नहीं लिया। घटना की पुनरावृत्ति पुलिस की लापरवाही का नतीजा है।
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स्थानीय लोगों को यह चिंता भी सता रही है कि मूर्ति की बरामदगी न होने से इस ऐतिहासिक स्थल का वजूद मिट जाएगा।

करोड़ों रुपये कीमती की इस मूर्ति को छह अप्रैल को बदमाश लूट कर ले गए थे। उपेक्षा का शिकार अपनी गाथा को मूक रूप से प्रदर्शित कर रहे गंगा के उत्तरी छोर में बसे शिवराजपुर के पौराणिक महत्व का विस्तृत वर्णन ब्रह्मपुराण के उन्नीस वें अध्याय में है।

पार्वती व मीराबाई की तपोस्थली शिवराजपुर को गौरी कुमारिका क्षेत्र भी कहा जाता है। स्वतंत्रता संग्राम में ही इस स्थल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

भक्तिकाल में संपूर्ण भारत में चर्चा का विषय बनी मीरा ने इस मूर्ति को चित्तौड़गढ़ से लाकर तपोस्थली शिवराजपुर में स्थापित किया था।

गिरधर गोपाल की यह प्रतिमा मानोवांछित फल देने के साथ ही भव्य आकर्षण के साथ अपनी अलग छटा अलग बिखेरने वाली रही है।

इस मंदिर के प्रबंधन के लिए चित्तौड़गढ़ से धनराशि अर्से तक आती रही है। शिवराजपुर में जगजननी माता पार्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए यहीं तपस्या व पूजा अर्चना की थी। यहां के गंगेश्वर शिव मंदिर की प्रमाणिकता इसलिए अधिक है कि यहां स्थित शिव लिंग सुबह पूजा हुआ मिलता है।
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कहा जाता है कि अश्वस्थामा यहां स्थापित गंगेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं। यहां के प्राचीनतम मंदिरों में सिद्धेश्वर, कपिलेश्वर, अंगदेश्वर, पंचवटेश्वर, मुंडेश्वर, भैरवश्वर, शगुनेश्वर आदि दर्जनों मंदिर रखरखाव के आभाव में जीर्णशीर्ण दशा को पहुंच रहे हैं।  आज उपेक्षा के शिकार बने शिवराजपुर में समय समय पर ऋषियों का पदार्पण होता रहा है। इस पौराणिक स्थल के महत्व को जानकर 1872 में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी सरस्वती ने एक वर्ष रहकर साधना की थी।  

इंसेट
कभी नाव से होता था व्यापार
बिंदकी। शिवराजपुर लघु बंदरगाह के बाद तहसील व थाना भी था। यहां नाव से जब व्यापार होता था, तब तक यहां की रौनक देखते ही बनती थी। समय के अनुसार उपेक्षा का शिकार होते गए इस स्थल को अभी तक पर्यटन स्थल बनाए जाना तो दूर रहा। पुरातत्व विभाग को भी शासन व प्रशासन ने इसे नहीं दिया, जिससे प्रचीन धरोहर को सुरक्षित किया जा सके।
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