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गुमनाम हो गई आजादी के नायक की जन्मस्थली

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औंग आजादी के नायक जोधा सिंह अटैया की जन्मस्थली गुम हो गई है। जोधा सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत की हालत खराब कर दी थी। बाद में अंग्रेजी सेना ने खजुहा के पास बावन इमली पर 51 साथियों के साथ फांसी पर लटका दिया था। अपेक्षा से अब जन्मस्थली के इर्द-गिर्द गोबर के ढेर जमा हैं। जहानाबाद विधानसभा के देवमई ब्लॉक के रसूलपुर गांव को जोधा सिंह अटैया के नाम से जाना जाता था। बिंदकी तहसील क्षेत्र के खजुहा कस्बे के पास 52 इमली शहीद स्मारक स्थल बना है। यहां रसूलपुर के जोधा सिंह और उनके 51 साथियों को 28 अप्रैल 1858 को इमली के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया था।
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10 मई 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने क्रांति का शंखनाद किया तो उसकी गूंज पूरे भारत में सुनाई दी। 10 जून 1857 को फतेहपुर के क्रांतिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए। इनका नेतृत्व जोधासिंह अटैया ने किया। फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खां भी सहयोगी थे। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी और कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया। क्रांतिवीरों का संबंध तात्या टोपे से था। जोधासिंह ने 27 अक्तूबर 1857 को महमूदपुर गांव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को जलाकर मार दिया था।
सात दिसंबर1857 को गंगा पार रानीपुर पुलिस चौकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया। जोधासिंह ने अवध एवं बुंदेलखंड के क्रांतिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया। मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने क्रांति सेना पर हमला कर दिया। गुरिल्ला युद्ध में कर्नल पावेल मारा गया। इसके बाद अंग्रेजों ने कर्नल नील के नेतृत्व में सेना की नई खेप भेजी। इससे क्रांतिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी। बाद में जोधासिंह ने छद्म भेष में प्रवास प्रारंभ कर दिया। किसी देशद्रोही ने उनके घोरहा गांव के पास होने की सूचना अंग्रेजी सेना को दे दी। घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया। उन्हें 51 क्रांतिकारी साथियों के साथ बंदी बना लिया गया।
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