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गर्वनर हाउस तक पहुंची रमेश के बागों की खुशबू

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रमेश सिंह द्वारा की जा रही गुलाब की खेती। संवाद - फोटो : FATEHPUR
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खागा। प्रगतिशील किसान रमेश सिंह ने अपनी मेहनत और नई तकनीक से ऐसा कृषि फार्म तैयार किया है। जहां खिलने वाले फूलों की खुशबू उत्तर प्रदेश के गवर्नर हाउस तक पहुंची है।
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बागवानी, जैविक खाद का निर्माण, जैविक खेती, सीप पालन (मोती) उत्पादन के माध्यम से उन्होंने अपने साथ ही क्षेत्र की पहचान यूपी के राजभवन तक पहुंचाई है। रमेश सिंह तहसील क्षेत्र के अकोढ़िया गांव के रहने वाले हैं।
जैविक खाद के जरिये रमेश सिंह ने अपनी और कई किसानों की तस्वीर बदली है। पहले गोबर गैस, फिर नाडेप (जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया) और अब वर्मी कंपोस्ट खाद से वह फल, फूल, सब्जी व फसल की खेती को एक नया आयाम देने में लगे हुए हैं। उनकी अलग सोच ने उनके घर के आसपास एक पर्यावरण संरक्षण, जल संचयन का अनोखा दृश्य बना दिया है।
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करीब दो बीघे में गुलाब, गेंदा, ग्लैडियोलस सहित कई प्रजाति के फूलों की खेती की है। इसके साथ ही आलू, धनिया, मिर्च, प्याज, धान, गेहूं की खेती भी करते हैं। फसलों की खेती की लिए वह सीड ड्रिल पद्धति का प्रयोग करते हैं।
घर के चारों ओर आम, अमरूद, शीशम, सागौन, यूके लिप्टस, हरे व पीले बांस लगाए गए हैं। जैविक खाद बनाकर किसानों में सप्लाई करने और उन्हें जागरूक करने का काम भी किया जा रहा है।
जिसका असर किसानों और उनकी फसलों में दिखाई दे रहा है। इसके लिए राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने प्रगतिशील किसान रमेश सिंह को सम्मानित कर चुकी हैं।
वर्ष 2020 में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को प्रगतिशील किसान रमेश सिंह के घर जाना था, लेकिन मौसम खराब होने के कारण फिर नहीं पहुंची। थरियांव के एक कार्यक्रम में बुलाकर उन्हें सम्मानित किया गया था।
सीप पालन करने वाले इकलौते किसान
रमेश सिंह करीब दो साल से सीप पालन (मोती) का काम करते हैं। घर के पीछे ही उन्होंने खुद की जमीन पर तालाब बना रखा है। वह फतेहपुर, कौशांबी, बनारस से सीप खरीदकर लाते हैं। उनके अंदर डाई (मोती बनाने का सांचा) रखकर उन्हें पानी में छोड़ देते हैं। लगभग डेढ़ साल के अंतराल में उन्हें सीप से मोती प्राप्त होते हैं। जिसे वह बिक्री करते हैं। सीप पालन करने वाले रमेश सिंह जिले में इकलौते किसान हैं।
सीड ड्रिल पद्धति को पहुंचा रहे जन-जन तक
रमेश सिंह सीड ड्रिल पद्धति से खेती किए जाने का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। यह पद्धति किसानों के लिए बहुत ही लाभदायक है। यहां शुरूआत में थोड़ी लागत आती है, लेकिन इसका फायदा भी बहुत हैं। सीड ड्रिल पद्धति के जरिये बीज की बुवाई खेत में एक लाइन से होती है। उन्हें उर्वरक भी उचित मात्रा में मिल जाता है। बीज भी कम लगता है। इस पद्धति से फसल तैयार करने में लागत कम और पैदावार अधिक होती है।

सीप को तालाब में डालते रमेश सिंह। संवाद- फोटो : FATEHPUR

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