फतेहपुर/खागा। विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा। पार्टियां एक दूसरे के कामकाज से लेकर सवाल उठाकर इसका सियासी लाभ लेने के लिए आतुर रही हैं। इन तीखी टिप्पणियों के साथ राजनीतिक कद्दावरों ने एक दूसरे के किले को ढहाने के लिए जबरदस्त नारे (स्लोगन) भी दिए।
कुछ नारे तो ऐसे बने जो लोगों की जुबां पर चढ़ गए। कुछ नारों के जरिये चुनाव का ऐसा माहौल बदला कि सरकार तक बन गई। दो से तीन दशक पीछे जब सोशल मीडिया और प्रचार-प्रसार के यह तरीके नहीं थे, तो उस समय चुनावी नारे ही घर-घर तक पहुंचते थे।
शाम को निकलने वाली समर्थकों की टोलियां और उनके जुबां पर यह नारे ही चुनावी पारे को ऊपर चढ़ाते थे। पहले नारे, इसके बाद प्रचार के लिए नए-नए गीत लिखे जाने लगे। पढ़ाते हैं आपको समय-समय पर पार्टियों की ओर से दिए गए चुनावी नारों की कहानी। (संवाद)
राम मंदिर आंदोलन के दौरान बने नारे
वर्ष 1991 में राम मंदिर आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद ने नारा दिया गया, बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का। इस नारे ने भाजपा को यूपी में सत्ता पर काबिज करने में बड़ी मदद की। भाजपा से कल्याण सिंह मुख्यमंत्री चुने गए।
बाबरी विध्वंस के बाद भाजपा ने एक नारा दिया, रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। यह नारा आज तक जीवंत बना हुआ है। 1993 में मंदिर की लहर को एक नारे ने थाम लिया।
जब मुलायम सिंह और कांशीराम ने एक साथ मंच साझा किया। तब एक नारा दिया गया मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम। इस नारे की बदौलत यूपी में मुलायम सिंह ने सरकार बनाई।
गेस्ट हाउस कांड के बाद फिर से निकले स्लोगन
रामंदिर की लहर को रोकने के बाद 1995 में मायावती पर जानलेवा हमला हुआ। इसे गेस्ट हाउस कांड के नाम से जाना गया। मायावती के समर्थन वापस लेने पर मुलायम सरकार गिर गई और चुनावी माहौल बदलने के लिए नए-नए नारे निकलने लगे।
बसपा ने सपा पर गुंडाराज की मुहर लगाई और नारा बनाया चढ़ गुंडन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर। पत्थर रख लो छाती पर, बटना दबाओ हाथी पर। बसपा ने भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ भी नारे बनाए। इसमें चलेगा हाथी, उड़ेगी धूल, ना रहेगा पंजा, न रहेगा फूल। इन नारों ने माहौल को बदला और मायावती की सरकार बन गई।
बसपा की सोशल इंजीनियरिंग पर भी बने नारे
2007 में बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इस चुनाव में बसपा ने बहुजन हिताय की जगह सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का नारा दिया था। ब्राम्हणों को साथ जोड़कर मायावती ने सरकार बनाई। इस दौरान दो नारे खूब चर्चित हुए।
इसमें पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा और हाथी नहीं गणेश है, ब्रम्हा, विष्णु, महेश है शामिल रहा। इसी चुनाव में सपा ने बसपा के खिलाफ नारा निकाला, गुंडे चढ़ गए हाथी पर गोली मारो छाती पर। यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहां है कम। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए नारा दिया था यूपी में था दम, लेकिन कहां पहुंच गए हम।
2017 के चुनाव में भी चर्चा में रहे यह स्लोगन
इस चुनाव में सपा ने अखिलेश यादव को केंद्र में रखकर अपने स्लोगन तैयार किए थे। इसमें अखिलेश का जलवा कायम है, उसका बाप मुलायम है, जीत की चाभी, डिंपल भाभी, यूपी की मजबूरी है, अखिलेश यादव जरूरी है, हालांकि यह नारे सपा को जीत नहीं दिला सके थे।
मोदी लहर में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था। इस चुनाव में सपा व कांग्रेस का गठबंधन था। नारा दिया गया था, यूपी को ये साथ पसंद है। जबकि भाजपा का नारा था, अबकी बार 300 के पार।
वर्ष 2022 में माहौल को बदल रहे यह नारे
भारतीय जनता पार्टी
- सोच ईमानदार, काम दमदार, फिर एक बार भाजपा सरकार
- सौ में साठ हमारा है, 40 में बंटवारा है, उसमें भी हमारा है
- अबकी बार 300 के पार
- 22 में योगी, 27 में योगी (गीत)
समाजवादी पार्टी
- यूपी का ये जनादेश, आ रहे है अखिलेश
- 22 में बाइसकिल
- नई हवा है, नई सपा है
- बड़ों का हाथ, युवा का साथ
- जनता सपा के साथ है, 22 में बदलाव है
- पिछड़ों-दलितों का इंकलाब होगा, 22 में बदलाव होगा
- युवा बेरोजगारों का इंकलाब होगा, 22 में बदलाव होगा
- अखिलेश यादव बोल रहा हूं (गीत)
बहुजन समाज पार्टी
- भाईचारा बढ़ाना है, बसपा को लाना है
- सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय
- बेटियों को मुस्कुराने दो, बहन जी को आने दो
कांग्रेस
- बेटी हूं, लड़ सकती हूं
आजादी के बाद दिल्ली तक पहुंची नारों की गूंज
- इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं
- जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल
- बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है
- एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर
- स्वर्ग से नेहरू रहे पुकार, अबकी बिटिया जहिहो हार
- इंदिरा लाओ, देश बचाओ
- आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे
- जात न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर
- राजीव तेरा यह बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान
- जब तक सूरज-चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा
- यह देखे इंदिरा का खेल, खा गई राशन, पी गई तेल