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मक्का पर कीटों की मार, 15 फीसदी फसल को नुकसान

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फतेहपुर में कभी बारिश तो कभी तेज धूप ने मक्का किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मक्का की फसल पर कीट लगना शुरू हो गए हैं और अभी तक 15 फीसदी फसल इसकी जद में आ चुकी है। सबसे ज्यादा नुकसान फाल आर्मी वर्म कीट से हो रहा है। इसके अलावा प्रारोह मक्खी, तना बेधक कीट, पत्ती लपेटक कीट भी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। नुकसान की बढ़ती चिंता को देखते हुए कृषि विभाग ने दवा के छिड़काव की अपील की है। जिला कृषि अधिकारी सत्येंद्र सिंह ने किसानों से नजदीकी कृषि रक्षा इकाई से संपर्क कर इस बारे में जानकारी लेने को कहा है।
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जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि कन्नौज और कानपुर क्षेत्र में मक्का की फसल को कीटों ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जिले में हालांकि अभी नुकसान बहुत कम है लेकिन फिर भी इससे सचेत होने की जरूरत है। प्रारोह मक्खी घरेलू मक्खी से भी छोटे आकार की होती है। इसके नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 प्रतिशत एक लीटर पानी में प्रति हेक्टअर छिड़काव करें। या फिर क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी 1.5 लीटर रसायन को प्रति हेक्टेअर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव किया जाना चाहिए।
तना बेधक कीट के शरीर में चार भूरी धारियां पाई जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए 5 से 10 ट्राईकोकार्ड प्रति हेक्टेअर की दर से प्रयोग करना चाहिए। क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी की 300 मिली मात्रा को 400 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। लैम्डा-साई हेलोथ्रिन पांच प्रतिशत की 400 मिली मात्रा 400 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
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पत्ती लपेटक कीट की सूडी हल्के पीले रंग की होती है। इस कीट से बचाव के लिए क्यूनालफास 25 प्रतिशत ईसी 500 मिली अथवा 40 प्रतिशत ईसी 500 मिली मात्रा 500-600 लीटर पानी का घोल बनाकर प्रति एकड़ छिड़काव कराकर फसल को क्षति से बचाया जा सकता है।
जिला कृषि रक्षा अधिकारी सत्येंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान समय मक्का की फसल का है। इस फसल को क्षति पहुंचाने वाले प्रमुख चार प्रमुख कीट हैं। कन्नौज और कानपुर में इन कीटों ने अच्छी तादात में फसल को नुकसान पहुंचाया है। जिले में भी यह बढ़ रहा है। इनकी पहचान करके समय से उपचार कर अच्छी पैदावार ली जा सकती है। इसके लिए नजदीकी कृषि रक्षा इकाई से संपर्क कर बचाव के उपायों की जानकारी ली जा सकती है।
फाल आर्मी वर्म कीट की मादा ज्यादातर पत्तियों की निचली सतह पर अंडे देती हैं। कभी कभार ऊपरी सतह के साथ तने में भी अंडे दे देती हैं। एक से ज्यादा सतह में अंडे देने के बाद सफेद झाग से ढक देती हैं। अंडे हल्के पीले या भूरे रंग के होते हैं। कीट का लार्वा भूरा धूसर रंग का होता है। इसमें तीन पतली सफेद धरियां और सिर उल्टा करने पर अंग्रेजी अक्षर का वी जैसा दिखता है। शरीर के अंतिम खंड पर वर्गाकार चार गहरे बिंदु दिखाई देते हैं। इस कीट का लार्वा मक्के के छोटे पौधे के गोभ के अंदर घुसकर अपना भोजन प्राप्त करता है।
फसल की बढ़वार अवस्था में पत्तियों में छिद्र एवं पत्तियों के बाहरी किनारों पर इस कीट के उत्सर्जित पदार्थो से की जा सकती है। इसकी रोकथाम के लिए शाम के समय सात से नौ बजे तक तीन से चार संख्या में प्रकाश प्रपंच लगाना चाहिए। छह से आठ की संख्या में बर्ड पर्चर प्रति एकड़ लगाकर प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। 35-40 फेरोमोन ट्रेप प्रति हेक्टेअर की दर से लगाकर नियंत्रण किया जा सकता है। फाल आर्मी के अंडे एकत्र कराकर नष्ट करा देने से भी बचाव होता है। एनपीबी 250 ईसी अथवा मेटाराइजियम एनिप्सोली पांच ग्राम प्रति लीटर अथवा बैसिलस थुरिनजैननसिम (बीटी) दो ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग करना लाभकारी होता है।
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