अगर सब ठीक रहा तो पांच साल से बंद उत्तर प्रदेश सहकारी कताई मिल में फिर मशीनों का शोर होगा। ऐसा हुआ तो रोजगार के लिए सूरत, दिल्ली व मुंबई जैसे महानगरों का रुख करने वाले युवाओं की संख्या में कमी आएगी।
मालूम हो जिले में उत्तर प्रदेश सहकारी कताई मिल लिमिटेड की नींव सन 1984 में रखी गई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी ने भूमि पूजन किया था। यह मिल 1986 में वजूद में आई। जिसमें सैकड़ों स्थानीय बेरोजगारों के साथ दूसरे प्रदेश उड़ीसा, बंगाल, बिहार, गुजरात के युवाओं को रोजगार मिला था। सरकारी नीतियों व बिजली संकट के चलते उत्पादन पर असर पड़ने से मिल की मशीनें शांत होने लगी। सन 2010 में सूबे की अन्य सहकारी कताई मिलों के साथ जिले की यह मिल भी बंद कर दी गई।
मिल बंद होने से इस पिछड़े जनपद में रोजगार पाने का एक खास जरिया छिन गया। उसके जिले के युवाओं को रोजीरोटी के लिए सूरत, दिल्ली, मुंबई का रुख करना पड़ा। मजदूरों व अफसरों के लिए बनी मिल की कालोनियां वीरान हो चुकी हैं। मौजूदा समय में मिल में सिर्फ सुरक्षा गार्ड नजर आते हैं। प्रदेश सरकार की मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में सूबे की नौ सहकारी कताई मिल चलवाने के लिए बिड डाक्यूमेंट पर मुहर लगा दी है। यह मिलें फतेहपुर के अलावा इटावा, संत कबीरनगर, बिजनौर, सीतापुर, फर्रुखाबाद, गाजीपुर, बरेली, अमरोहा व इलाहाबाद की हैं। यूजर चार्ज पर इन्हें चलाने का फैसला कई महीने पहले लिया जा चुका है। मिलों के संचालन को बिड डाक्यूमेंट के प्रावधान को रजामंदी मिल चुकी है। उत्तर प्रदेश सहकारी कताई मिल के काटन इंचार्ज डीके शुक्ला का कहना है कि सरकार ने 10 साल की लीज पर मिल का संचालन कराने का फैसला लिया है।
फतेहपुर। उत्तर प्रदेश सहकारी कताई मिल चितौरा के संचालन की उम्मीद भले ही बढ़ गई है, लेकिन राह इतनी आसान भी नहीं दिखती। करीब 150 बीघा के क्षेत्रफल मेें इस मिल का दायरा है। जिसमें प्रोडक्शन प्लेस समेत आवासीय कालोनी हैं। मौजूदा समय में मिल में पुरानी टेक्नालाजी की मशीनें लगी हैं। इन मशीनों को लगातार 24 घंटे चलाकर सात से आठ सौ वर्कर के बलबूते सात से आठ टन का उत्पादन किया जा सकता है। नई टेक्नोलॉजी की बात करें तो इतने ही समय में आधे वर्कर के सहारे 22 टन तक उत्पादन किया जाता है। ऐसी दशा में यूजर चार्ज के एवज में इस मिल को चलाने के लिए कार्यदायी संस्था को इंफ्रास्ट्रक्चर बदलना होगा।