फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जरा सी समझदारी, नहीं तो जिंदगी हारी

Fri, 28 Nov 2014 05:30 AM IST
Fatehpur
विज्ञापन
विज्ञापन
फतेहपुर। 22 नवंबर, दिन रविवार। रात के लगभग आठ बजे थे। कुरुस्तीकलां रेलवे स्टेशन के पास रेल लाइन क्रास करते समय मलवां थाना के कोराई गांव निवासी घुन्नू पाल को कहां पता था कि ट्रेन भी आ सकती है। अचानक ट्रेन की चपेट में आकर घुन्नू पाल की मौत हो जाती है। 11 नवंबर, दिन मंगलवार। कल्याणपुर थाना क्षेत्र के बसावनखेड़ा निवासी मोहन लाल की गुगौली रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पार करते वक्त ट्रेन से कटकर मौत हो जाती है। यह तो कुछ नहीं है। विभागीय आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल अब तक बंद फाटक से गुजरने और ट्रैक पार करने में अब तक 66 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि पचास से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं।
विज्ञापन

रेलवे ट्रैक और प्लेटफार्म में बरती जाने वाली लापरवाही जिंदगी छीन रही है। सच तो यह है कि ट्रेन से होने वाली मौतों की यह संख्या किसी महामारी, हत्या अथवा आंतकी वारदातों से मरने वालों की संख्या से कम नहीं है। जिले के 100 किलोमीटर ट्रैक दायरे में होने वाले हादसे चौंका रहे हैं। चालू साल में जनवरी से अब तक 66 मौतें हो चुकी हैं। इनमें से कुछेक मौतें तो आदर्श रेलवे स्टेशन की गवाह बन चुकी हैं। ट्रैक हादसे मेें आधा सैकड़ा लोग जख्मी हुए हैं। इनमें से सामान्य जख्मी होने वालों को रेलवे अस्पताल में उपचार कराया गया जबकि गंभीर घायलों को सदर अस्पताल अथवा कानपुर भेजना पड़ा। वर्ष 2013 में रेलवे ट्रैक पर मरने वालों की संख्या 48 रही। जबकि 70 लोग जख्मी हुए थे। वर्ष 2012 में ट्रैक हादसे में 46 मौतें हुईं वहीं घायल होने वाली संख्या 80 रही। दरअसल, ये मौतें ट्रेन हादसा से ज्यादा चूक के चलते हो रही हैं। ट्रैक में मौतें न हों और लोग अपने घर तक सही सलामत पहुंच सके, इसके लिए रेलवे प्रशासन की ओर से कोई खास प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। जीआरपी व आरपीएफ के लिए ट्रेन हादसे बड़ी चुनौती जरूर साबित हो रहे हैं। उधर, भले ही नवंबर महीने में सड़क हादसोें को रोकने के लिए अभियान चलाया जा रहा हो ट्रैक हादसों की रोकथाम का काम कतई नहीं हो रहा है। रेलवे प्रशासन का जागरूकता अभियान केवल एनाउंस तक सीमित है। वह भी ट्रेन आने से कुछ देर पहले से लेकर जाने के कुछ देर बाद तक नजर आता है। उधर, आदर्श रेलवे स्टेशन के अस्पताल में घायलों को केवल फर्स्ट एड की सुविधा है। तीन साल में अब तक दो सौ घायलों की उभर कर सामने आई संख्या में इक्का दुक्का को छोड़कर सदर अस्पताल भेज दिया गया। जबकि गंभीर रोगियों को कानपुर भेजा जाता है

रेलवे एक्ट पर अमल नहीं
रेल लाइन पार करने पर धारा 147 के तहत 500 रुपये जुर्माना या फिर 10 दिन की कैद हो सकती है। इसी प्रकार से कूपे के पायदान पर सफर करने वाले मुसाफिर को धारा 156 के तहत ऐसी ही सजा भुगतनी पड़ सकती है। बात जहां तक एक्ट का पालन करने और कराने की है तो रेलवे प्रशासन से लेकर यात्री समेत आम लोग कन्नी काट रहे हैं।
विज्ञापन


जनरल कूपों का सफर ज्यादा खतरनाक
अमूमन ट्रेन से गिरने वाले यात्री जनरल कूपों में सवार होते हैं। इन कूपों में बैठने की जगह नहीं होेने से यात्री कूपे के दरवाजे पर बैठकर या फिर लटक करके यात्रा करते हैं। इस तरह की यात्रा जरा सी चूक भारी पड़ जाती है।


‘ रेलवे एक्ट का पालन कराने का पूरा प्रयास किया जाता है। गौर करने वाली बात यह है कि ट्रैक हादसों में ज्यादातर रेल यात्री के बजाए आम लोग होते हैं। गांव किनारे से गुजरी पटरियों को पार करने में अक्सर लापरवाही की जाती है। जो कि जिंदगी पर भारी पड़ती है’। - मनोज शर्मा, प्रभारी थानेदार, आरपीएफ

‘रेल हादसे रोकने के प्रयास किए जाते हैं। जनता को चाहिए कि वह खुद जिंदगी का मोल समझे। जिंदगी को दांव पर लगाने से बाज आया जाए। इस प्लेटफार्म से उस प्लेटफार्म जाने वाले यात्रियों को फुटओवर ब्रिज का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जाता है। ट्रेन के प्लेटफार्म में रुकने पर कूपे चेक किए जाते हैं’। - बृजेश यादव, थानेदार, जीआरपी
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें