फतेहपुर। मां और बच्चे नानी-नाना के घर क्या सोच कर आए थे और क्या हो गया। किसी को क्या पता था कि नियति को कुछ और ही मंजूर है। जीवनसाथी और जिगर के टुकड़ों को खो देने के बाद घायल सुशील ने तो खामोशी की चादर ओढ़ ली है, शायद उसके दिल में भी यह हूक रह रहकर उठती होगी कि आखिर यह सब देखने के लिए वह जिंदा क्यूं है। आखिर बार अपनों को साथ लेकर वह जिस कोठरी में सो रहा था, वही सबके लिए कब्रगाह बन गई।
अफसोस! गांव की बेटी को बचा न सके
- बचाने में ग्रामीणों ने झोंकी पूरी ताकत
- भोर चार बजे तक चला राहत कार्य
फतेहपुर। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कोठरी ढहने में दबे परिवार को निकालने में दो घंटे कड़ी मशक्कत की गई। ग्रामीणों को यह अफसोस खाए जा रहा है कि पूरी ताकत झोंकने के बाद भी गांव की बेटी और मासूमों को जिंदा नहीं निकाला जा सका। मलबे से ठसाठस कोठरी में जहां तिल रखने की जगह नहीं थी, वहां ग्रामीणों ने बारिश में परिवार को बचाने की जद्दोजहद की। जाफरगंज थाना क्षेत्र के गहरुखेड़ा गांव में शैलेन्द्र श्रीवास्तव उर्फ पिंटू के घर आई बहन पूजा और उसकी तीन मासूम पुत्रियों गायत्री, प्रिया, गुड़िया का कोठरी में दम घुटा है। मृतका के चाचा शिव शरण ने बताया कि उसकी भतीजी और उसके परिवार के लिए कच्ची कोठरी काल बन गई। वे कोठरी ढहने की आवाज सुनकर दौड़कर पहुंचे थे, लेकिन मलबे से कोठरी पटी पड़ी थी। अंदर घुसने के लिए कोई रास्ता नहीं था। दामाद सुशील की ही अंदर से कराहने की आवाज आ रही थी। उस समय लगभग रात के करीब तीन बजे थे। हादसा देखकर परिजनों में दहशत भर गई थी। वह लोग कुछ सोच समझ नहीं पा रहे थे। परिवार की चीख पुकार सुनकर पड़ोसी ग्रामीण भुल्लू, कल्लू, गोरे, भोलू, आशीष, अशोक भी आ गए थे। उन लोगों ने फावड़े, कुदाल, सबरी की मदद से टूट पड़े थे। इन ग्रामीणों ने कड़ी मशक्कत की और तीन बजे करीब अंदर घुसने का रास्ता बना सके। ग्रामीणों ने दो टूटी पड़ी धन्नियों के बीच में फंसे सुशील को बाहर निकाल लिया। जिससे ग्रामीणों को लगा कि वह परिवार को जल्द ही बचा लेंगे। इसके बाद पूनम और उसके बच्चों को खोजने लगे। करीब पांच फिट मलबे के नीचे पूनम और उसकी बांहाें में लिपटी एक साल की बेटी गुड़िया को निकाला गया। लेकिन दोनो की मौत हो चुकी थी। दोनों शवों के कोठरी के बाहर आते ही कोहराम मच गया। इसके बाद मलबे में दबी गायत्री और प्रिया को खोजना शुरू किया गया। ग्रामीण सुबह साढ़े चार बजे मिट्टी के ढेर से दोनो बच्चियाें को मृत हालत में निकाल सके। दोनो एक दूसरे के बगल में पड़ी थी। उन दोनों की भी मौत हो चुकी थी। ग्रामीणों का कहना रहा कि उनकी मेहनत बेकार गई है। परिवार की जानें बच जाती सब कुछ सार्थक हो जाता। उन लोगों का इसी बता का अफसोस है कि वह लोग सुशील के अलावा किसी की जानें नहीं बचा सके हैं।
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पिता, मां व भाई का रो- रोकर बुरा हाल
जाफरगंज। मायके आई बिटिया पूजा व तीनों नातिनों की मौत का पिता भगवान शरण, मां शशिबाला व भाई पिंटू क ो गहरा सदमा पहुंचा है। इन सब का रो- रोकर बुरा हाल है। पड़ोसी रिश्तेदार समझाने व ढांढस बंधाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन मां बेहोश होकर गिर जाती थी।
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पड़ोसी की दीवार बनी हादसे की वजह
जाफरगंज। गांव गहरूखेड़ा में कोठरी घर गिरने से हुई चार की मौत के मामले में पड़ोसी की बन रही दीवार वजह बनी है। कुछ लोगों का आरोप है कि पड़ोसी ने कुछ दिन पहले ही कोठरी के बगल में अपनी भूमि की नींव जेसीबी मशीन लगाकर खुदाई थी। दीवार बनाने के बाद बीच में जगह छूट गई थी, जिसमें बारिश का पानी जा रहा था जिससे कच्चे ईंटों की कोठरी गिर गई।
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मौत की दस्तक को जान गई थी बीनू
फतेहपुर। अगर एक मिनट का समय मिल जाता तो पूजा अपनी एक साल की बच्ची को लेकर कोठरी के बाहर निकल चुकी होती। कोठरी गिरने से पहले ही दस्तक हो गई थी। इस दस्तक की आहट को मृतका की छोटी बहन बीनू जान गई थी। सुशील के परिवार के साथ शैलेन्द्र की 18 वर्षीय बहन बीनू उसी कोठरी में सोई थी। परिजनों ने बताया कि बीनू के चेहरे पर अचानक छत से मिट्टी का टुकड़ा गिरा था। जिससे उसकी नींद खुल गई थी। उसने देखा कि छत और दीवार हिल रही है। यह देखकर वह तेज से चीखी और सो रही बहन पूजा को उठकर भागने की आवाज दी। जब पूजा अपनी गोद में एक साल की बच्ची को लेकर बाहर भाग रही थी, तभी छत भरभरा कर ढह गई। अगर कुछ पलों पहले बीनू की नींद खुल जाती तो शायद पूरे परिवार की जान बच जाती।
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रामलीला में मची अफरा-तफरी
फतेहपुर। परिवार पर कहर टूटने की जानकारी से ग्रामीणों में हड़कंप मच गया। ग्रामीण गांव के मंदिर में हो रही रामलीला देख रहे थे। बरसात भी शुरु हो गई थी। घटना की जानकारी सुनकर रामलीला छोड़कर पीड़ित परिवार की मदद के लिए ग्रामीण मौके पर पहुंच गए। जो ग्रामीण घटना के बारे में सुनता वह सीधे घटनास्थल की ओर पहुंच जाता। आयोजन में अफरा तफरी का माहौल हो गया।