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पीजी का हजार से नीचे बस्ता नहीं बंधता

Thu, 18 Apr 2013 05:30 AM IST
Fatehpur
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फतेहपुर। कांवेंट एजूकेशन साल दर साल महंगी हो रही है। और इसमें अहम भूमिका निभा रहा है प्रकाशकों, बुक स्टाल मालिकों और स्कूल प्रबंधन का मजबूत त्रिकोण। इस त्रिकोण को भेद पाना आम अभिभावकों के बस में नहीं है। नतीजतन लोगों को बच्चों के भविष्य के लिए तयशुदा दुकानों से महंगी कापी-किताब और स्टेशनरी खरीदनी पड़ रही है। शिक्षा के नाम पर चल रहे गोरखधंधे के प्रति विभागीय अधिकारी आंखें मूंदे हुए हैं। शहर में कांवेंट स्कूलों का नया शिक्षा सत्र शुरू हो चुका है। इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता इन दिनों जरूरी कामकाज छोड़कर पिछले साल के मुकाबले तीस से पैतीस फीसदी महंगी कापी-किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए मजबूर हैं। हालात यह है कांवेंट स्कूल से संबद्ध बुक स्टाल अभिभावकों से प्रिंट रेट पर कीमत धड़ल्ले से वसूल रहे हैं। शहर से लेकर कस्बों तक कापी-किताब और स्टेशनरी बेचने के नाम पर लूट मची हुई है। बुक स्टाल संचालक मुनाफे के लालच में कोई रियायत नहीं कर रहे हैं। यदि किसी अभिभावक के पास दस रुपया भी कम है तो उसे दी गई स्टेशनरी यह कहकर ले ली जाती है कि जब पूरे पैसे हाें तब आना।
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इंसेट

चाहिए, सौ में कम से कम बीस रुपया
फतेहपुर। कांवेेंट स्कूल प्रकाशकों से खुली सौदेबाजी करते हैं। एक प्रबंधक के मुताबिक कम से कम बीस फीसदी पर सौदा पटता है। वैसे प्रकाशक स्कूल की स्टेंथ के हिसाब से भी सौदेबाजी करते हैं। चूंकि प्रकाशक दूसरे प्रकाशक के कार्यक्षेत्र में जगह बनाना चाहते हैं, लिहाजा नए सत्र में स्कूल मैनेजमेंट को कमीशन का और हिस्सा मिल जाता है। यही वजह है हर साल नई किताबें क्लासेज में उतारनी होती है। एक स्कूल मैनेजमेंट की माने तो उसे एक बुकसेलर से तीन साल का एडवांस कमीशन देने की पेशकश हुई थी।

प्रशासन आगे आए तो बने बात
फतेहपुर। साल दर साल महंगी हो रही है कांवेंट एजूकेशन लेकिन अभिभावक असहाय है। लोग चाहते हैं प्रशासन इस संबंद में कुछ करे, क्योंकि उसे पता है कांवेंट स्कूलों पर शिक्षा विभाग का जरा भी अकुंश नहीं। बिंदकी के पैगबंरपुर मोहल्ला निवासी कृष्ण कुमार की नातिन अवंतिका पीजी की छात्रा है। उसका बस्ता पंद्रह सौ रुपया में बंधा है। शहर के चौक क्षेत्र स्थित हजारी लाल फाटक मेें रहने वाले रामप्रकाश गुप्ता का भतीजा कुशाग्र गुप्ता शहर के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में कक्षा पांच का छात्र है। बकौल रा प्रकाश आधा बस्ता बंधाने में पंद्रह सौ रुपया का खर्चा आया। इसमें पेंसिल व शार्पनर आदि स्टेशनरी शामिल नहीं है।
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डेढ़ सौ का बस्ता दूने दाम पर
फतेहपुर। कांवेंट स्कूलों का नया सत्र शुरू होने के साथ बस्ता और महंगा हो गया है। इसमें स्कूल मैनेजमेंट भी कम कुसूरवार नहीं। हालात यह है जो बस्ता बाजार में डेढ़ सौ में उपलब्ध है उसे स्कूल से तयशुदा बुक स्टाल से खरीदने पर दोगुने दाम वसूले जा रहे हैं। कई ऐसे स्कूल हैं जिनकी स्लिप थमाने पर अभिभावक को सीधा बस्ता थमा दिया जाता है। इसमें कापी-किताब, रबर ,पेंसिल, टिफिन बाक्स और थरमस तक शामिल हैं।


कोट्स
विभाग से मान्यता प्राप्त विद्यालयों में परिषदीय स्कूलों में चलने वाली पाठ्य पुस्तकें वैध हैं। इन स्कूलों में
निजी प्रकाशकों की कोई भी पुस्तक नहीं पढ़ाई जाती है। सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के स्कूल हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। इनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार बीएसए को नहीं है।
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- राजेंद्र प्रसाद यादव, बेसिक शिक्षा अधिकारी
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