अमर उजाला ब्यूरो
फतेहपुर।
जिले का एक गांव जहां जाने से डर लगता था, लेकिन आज हालात बदल गए हैं। ऐसा नहीं कि वहां अपराध बहुत अधिक था बल्कि एक ऐसी बीमारी लोगों की जिंदगी छीन रही थी, जो लग गई तो लाइलाज है। जागरूकता की अलख ऐसी जगी कि सात साल में यह रोग गांव में किसी नए को अपना शिकार नहीं बना पाया।
ब्लाक भिटौरा के इस गांव में साल 2005 में 52 एड्स रोगी मिलने से खलबली मच गई थी। एक-एक कर 2011 तक पीड़ित 42 लोग काल के गाल में समा गए। दहशत बढ़ी, पीड़ित परिवार से लोग दूर भागने लगे। बच्चों का स्कूल जाना छूट गया। तभी जिले की एक संस्था ने जागरूकता का बीड़ा उठाया। जिला प्रशासन व इलाकाई लोगों का सहयोग मिलने से अब यह संतोष है कि सात साल में कोई भी नया एड्स रोगी गांव में नहीं पनपा। हालांकि अभी भी दस रोगियों का नियमित इलाज चल रहा है।
स्वयंसेवी संस्था नेहरू युवा केंद्र के जिलाध्यक्ष राजेंद्र साहू ने बताया कि वर्ष 2005 में भिटौरा ब्लाक के इस गांव में स्वास्थ्य कैंप लगाने गए थे। यह मानकर गए थे कि सामान्य बीमारियों से लोग ग्रसित होंगे। पर, कैंप में कई महिलाएं ऐसी आईं जिनके शरीर में चकत्ते थे। पूछने पर महिलाएं टालने लगीं। जब खून की जांच कराई तो एचआईवी होने का पता चला। जांच में 52 लोग निकले तो होश फाख्ता हो गए। छानबीन चालू हुई तो पता चला कि यहां के कई लोग मुंबई कमाने गए थे और गलत संगत में पड़कर एड्स ग्रसित होकर गांव आए। उनसे उनकी पत्नी और फिर यह वंशानुगत हो गया। इलाज कराने को कोई तैयार नहीं था। गांव के लोग पीड़ितों का पता चलते ही उनसे दूरी बनाने लगे थे। काफी कोशिश के बाद पीड़ित परिवार के साथ-साथ आसपास के लोग भी जागरूक हुए हैं।
हालात ये हैं कि जब युवा कमाने जाते हैं तो संयमित रहते हैं जिससे गांव में कोई नया मरीज नहीं मिला है। यहां तीन एड्स रोगी गांव में हैं और सात रोगी मुंबई में रहकर अभी भी नौकरी कर रहे हैं। वह दवा लेने आते हैं।
एआरटी सेंटर कानपुर में हो रहा इलाज
एंटी रिट्रो वायरल थेरेपी (एआरटी) सेंटर कानपुर में इन मरीजों का इलाज चल रहा है। साथ ही गांव में भी लोगों की निगरानी की जा रही है। इन मरीजों को सरकार की ओर से प्रति माह पांच सौ रुपये सेंटर आने-जाने के लिए खर्च दिया जाता है। सेंटर से दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
चलाया जाता है जागरूकता अभियान
सीएमओ डा. विनय कुमार पांडेय का दावा है कि उनका विभाग भी जागरूकता कार्यक्रम चलाता है। एड्स आधुनिक युग की गंभीर और जानलेवा बीमारी है। यह कई रोगों का एक समूह है। मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से बीमारी ठीक नहीं हो पाती। एड्स रोग, एचआईवी के संक्रमण से होता है। एचआईवी संक्रमण होने के बाद एड्स की स्थिति तक पहुंचने में और लक्षण दिखने में आठ दस साल या ज्यादा समय भी लगने के कारण कई सालों तक रोगी को पता ही नहीं चलता कि उसे आखिर क्या हुआ है? एड्स रोगियों की मानीटरिंग की जा रही है।
ऐसे होता एड्स --
संक्रमित व्यक्ति से असुरक्षित यौन संबंध बनाने से। यदि मुंह में छाले या मसूड़ों से खून बह रहा हो तब भी संक्रमण हो सकता है। एड्स से ग्रसित रोगी पर प्रयोग किए हुए इंजेक्शन को दूसरे व्यक्ति के शरीर में लगाने से। एड्स संक्रमित खून प्राप्त करने से। एड्स मां के जन्म लेने वाले बच्चे को, एड्स ग्रस्त मां के दूध से होता है।
ऐेसे नहीं होता एड्स
एड्स रोग से ग्रस्त रोगी से हाथ मिलाने, चूमने या कसकर पकड़ने से। एड्स रोग से ग्रस्त रोगी के साथ रहने या खाना खाने से। छींकने या खांसने से मच्छर के काटने से भी नहीं होता है।
ये हैं लक्षण
अत्यधिक वजन कम होना, अधिक समय तक सूखी खांसी आना, बार बार बुखार आना, ग्रंथियों में सूजन आना। एक हफ्ते से अधिक समय तक पतले दस्त होना। बार बार फंगल इंफेक्शन होना। रात को पसीना आना। चमड़ी के नीचे मुंह पलकों के नीचे या नाक में लाल, भूरे, बैंगनी या गुलाबी रंग के धब्बे होना। याददाश्त कम होना। मानसिक रोग आदि।