जिले में साल दर साल अस्थमा के रोगी बढ़ रहे हैं। हर साल 3 से 5 फीसदी नए रोगी बढ़ जाते हैं। वाहनों की संख्या में इजाफा होने से मरीजों के बढ़ने का औसत भी बढ़ा है। पुरुषों में नशा व धूम्रपान के चलते रोगियों की संख्या में और इजाफा हो रहा है।
वाहनों का धुआं अस्थमा को बढ़ा रहा है। वाहनों के धुआं से निक लने वाला कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रो आक्साइड, हाइड्रोकार्बन, सल्फर डाईआक्साइड अस्थमा की बड़ी वजह हैं। बस्ती की बजाय सड़क के किनारे रहने वालों में इस रोग का प्रतिशत ज्यादा होता है। फिजीशियन डा. केएम द्विवेदी का कहना है कि पांच सालों से रोगियों के बढ़ने की दर पांच फीसदी तक पहुंच गई है।
डा. द्विवेदी के मुताबिक अस्थमा श्वांस नलिकाओं को प्रभावित करता है। श्वांस नलिकाओं में सिकुड़न या सूजन आ जाती है। इससे सांस लेने में कठिनाई होती है। खांसी, नाक बजने, छाती के कड़े होने के साथ ही संास लेने की समस्या बढ़ जाती है। रोगी को सांस लेने व छोड़ने में खासा जोर लगाना पड़ता है। शरीर में आक्सीजन की कमी से चेहरा नीला पड़ जाता है। दमा रोगी को स्पिरोमेटी, पीक फ्लो, चेस्टन एक्सरे, एलर्जी, ब्लड व शारीरिक टेस्ट कराना चाहिए।
अस्थमा रोग के लक्षण
रोगी को शुरुआत में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ते हैं।
दमा रोगी को कभी भी दौरे पड़ सकते हैं लेकिन रात 2 बजे के करीब समस्या बढ़ जाती है।
रोगी को कफ सख्त, बदबूदार और डोरीदार निकलता है।
सांस लेने में कठिनाई होती है।
सांस लेने में अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है।
लगातार छींक आना।
रात या सुबह तेज दर्द उठना।
अस्थमा की वजह
बीड़ी या सिगरेट का सेवन।
मानसिक तनाव, क्रोध व भय।
खून में किसी कमी के चलते।
लगातार नशीले पदार्थों का सेवन।
खांसी , जुकाम व नजला रोग अधिक समय तक रहने से ।
तीखे मिर्च मसाले व ज्यादा तला भुना खाने या गरिष्ठ भोजन से।
एलर्जी भी एक वजह है।
श्वांस नलिक ा में धूल व ठंड के चलते।
जानवरों की त्वचा, बाल , पंख व रोयें से।
फेफडे़, हृदय, गुर्दे व आंत की कमजोरी से।
बरतें सावधानियां
रोगी को तीखे मिर्च मसालों वाले पदार्थ नहीं खाने चाहिए।
रोगी को धूल व धुआं केे वातावरण से बचना चाहिए।
मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध व झगड़े से बचें।
शराब, तंबाकू व नशीले पदार्थों का सेवन बंद कर दें।
एअरटाइट गद्दे व तकिया का इस्तेमाल करें।
सख्त सतह वाले कारपेट अपनाएं।
पंखों वाले तकिया का इस्तेमाल न करें।
पालतू जानवर को बिस्तर व बेडरूम में न आने दें।
इनहेलेशन थेरेपी सस्ती
विश्व अस्थमा दिवस पर डा. केएम द्विवेदी सोमवार को मीडिया से रूबरू हुए। कहा कि अस्थमा के मरीजाें को इनहेलर नहीं छोड़ना चाहिए। इनहेलेशन थेरेपी सस्ती हो गई है। फिजीशियन डा. द्विवेदी ने बताया कि अस्थमा दीर्घकालिक बीमारी है। इसका लंबे समय तक इलाज चलता है। कई मरीज आराम मिलने पर इनहेलर लेना छोड़ देते हैं। यह हानिकारक है।
इनहेलेशन थेरेपी बहुत सस्ती हो गई है। इससे मरीजों को काफी आराम मिल रहा है। इससे बीमारी रोकने, अटैक रोकने, फेफड़ों को बचाने और जिंदगी की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद मिलती है।