करीब माहभर चली रस्साकशी के बाद आखिरकार रामसेवक यादव के सिर से जिलाध्यक्ष
का ताज उतर ही गया। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव एवं लोक निर्माण मंत्री
शिवपाल सिंह यादव की नाराजगी से आहत जिलाध्यक्ष रामसेवक यादव ने पार्टी
मुखिया मुलायम सिंह यादव को चिट्ठी लिखकर दुखड़ा रोया।
इस चिट्ठी ने दबी
चिंगारी को धधका दिया और रामसेवक यादव सहित समूची कार्यकारिणी को प्रदेश
अध्यक्ष ने भंग करने का ऐलान कर दिया। अमर उजाला ने चार फरवरी के अंक में
ही रामसेवक की विदाई के संकेत दे दिए थे। अब पार्टी जिला इकाई की कमान
पूर्व विधायक प्रताप सिंह यादव को सौंपी गई है।
करीब आठ माह पहले
चंद्रपाल सिंह यादव को हटाकर रामसेवक यादव को जिलाध्यक्ष की कमान सौंपी गई।
उम्मीद थी कि रामसेवक यादव पार्टी के अंदरखाने में चल रही गुटबाजी थामने
में कामयाब होंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी में खेमेबाजी व अनुशासनहीनता
दिनों दिन बढ़ती गई। जिलाध्यक्ष रामसेवक यादव कुछ ऐसे लोगों के घिर गए, जो
निजी स्वार्थ के लिए पार्टी की रीति-नीति को भी भुला दिया।
रामसेवक यादव
के अपने लोगों का दंभ इतना बढ़ गया कि वे पुराने पदाधिकारियों की अनदेखी
करने लगे। इसका नतीजा यह रहा कि कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के आमगन
में पार्टी पदाधिकारियों ने जमकर हुड़दंग मचाया। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष व
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संकिसा आगमन पर भी हंगामा हुआ। इस हंगामे के
दौरान कैबिनेट मंत्री एवं मुख्यमंत्री ने जिलाध्यक्ष रामसेवक यादव को फटकार
भी लगाई थी।
तभी से रामसेवक यादव की विदाई तय थी। इसी बीच रामसेवक यादव ने
जिला कार्यकारिणी की घोषणा की। कार्यकरिणी में दलबदलुओं को तरजीह दी गई।
इतना ही नहीं आठ फरवरी को मंडल प्रभारी प्रोफेसर रामगोपाल यादव के आगमन के
दौरान भी पार्टी कार्यालय में जमकर हंगामा हुआ था।
जिलाध्यक्ष से खिन्न थे प्रदेश अध्यक्ष
सपा
के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव जिलाध्यक्ष की कार्यप्रणाली से खिन्न थे।
इसकी झलक उनके संकिसा आगमन के दौरान भी दिखी थीं। इतना ही नहीं उन्होंने
जिलाध्यक्ष से मिलने से भी इनकार दिया। जिलाध्यक्ष रामसेवक यादव कई बार
लखनऊ पहुंचे। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव एवं कैबिनेट मंत्री
शिवपाल सिंह यादव से मिलकर अपना दुखड़ा सुनाने का प्रयास किया, लेकिन दोनों
नेताओं ने उन्हें मिलने का वक्त ही नहीं दिया।
इससे थक हारकर जिलाध्यक्ष
ने पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव को 24 फरवरी को चिट्ठी लिखा। मंगलवार को
पद छोड़ते वक्त जिलाध्यक्ष ने खुद यह बात स्वीकार किया। उन्होंने पार्टी
मुखिया मुलायम सिंह यादव को लिखी चिट्ठी में बताया कि ‘खासी कोशिशाें के
बाद भी नेताजी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व लोक निर्माण मंत्री शिवपाल यादव
से मुलाकात नहीं हो पा रही है। इससे जिले के हालाताें से अवगत नहीं करा पा
रहा हूं। अनुशासनहीनता तथा प्रशासनिक अधिकारियों के न सुनने से असहज महसूस
कर रहा हूं।
इससे पार्टी को क्षति हो रही है। पंचायत चुनाव सामने हैं।’
चिट्ठी के जरिए जिलाध्यक्ष ने पार्टी की मजबूती के लिए मार्गदर्शन मांगा
था। लेकिन हुआ एकदम उल्टी। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें अनुशासन
बनाने में अक्षम मानते हुए जिलाध्यक्ष पद से हटा दिया है। रामसेवक यादव ने
मंगलवार को पार्टी कार्यालय में बताया कि यह पार्टी का फैसला है। वह पार्टी
के सिपाही हैं। आगे भी पूरी निष्ठाओं के साथ काम करेंगे। इस्तीफा नहीं
दिया था। केवल हकीकत बताई थी।
सच साबित हुई अमर उजाला की भविष्यवाणी
अमर
उजाला ने चार फरवरी के अंक में शिवपाल के सामने हुड़दंग महंगा पड़ा शीर्षक
से खबर प्रकाशित किया था। इसमें बताया था कि जिले में पार्टी के हालात ठीक
नहीं है। संभावना जताई गई थी कि जिलाध्यक्ष सहित पार्टी के तमाम
पदाधिकारियों को पद से हटाया जा सकता है। पार्टी सूत्रों की मानें तो तीन
फरवरी की शाम ही जिलाध्यक्ष को हटाने की बात पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के
बीच चली थी।
लेकिन एक वरिष्ठ नेता के अड़ जाने की वजह से यह फैसला लंबित हो
गया था। रामसेवक यादव ने पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव को लिखी चिट्ठी
में अपनी पीड़ा जताते हुए अनुशासनहीनता का मुद्दा उठाया तो उन्हें हटाने
संबंधी पुरानी चिट्ठी की याद आई और पार्टी हाईकमान ने यह फैसला ले लिया।