बवाल के दौरान बेहोश हुए बंदी को लटकाकर ले जाते पुलिस कर्मी
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फर्रुखाबाद। सेंट्रल एवं जिला जेल में कैद बंदियों के साथ इलाज में लापरवाही की जाती है। इस संबंध में अमर उजाला बहुत पहले प्राथमिकता से खबर छाप चुका है। जेल में बंद कैदी यदि किसी बीमारी से बीमार होता है तो उसे लोहिया अस्पताल भेजने में कई दिन का समय लग जाता है। अमूमन देखा गया है कि इन दोनों जेलों से भेजे गए मरीज अस्पताल गेट पर ही दम तोड़ देते हैं। इसकी खास वजह यह है कि इन्हें भेजने में विलंब किया जाता है।
जेल प्रशासन रोगियों के इलाज के मामले को प्रतिसार निरीक्षक के ऊपर टाल देता है और गार्द न मिलने की बात कहकर रोगी को मरणासन्न अवस्था में कर लेता है। जब जेल प्रशासन को लगता है कि इस बंदी का बचना मुश्किल है तो उसे जेल की गार्द से अस्पताल भेज दिया जाता है। नतीजतन बंदी की मौत हो जाती है और डाक्टर उसे मरा पहुंचना लिख देते हैं। इस मामले में मजिस्ट्रेटी जांच लगाई जाती है। मजिस्ट्रेटी जांच छह माह में सिमट जाती है। कागजों में ही कैदी की मौत और जांच का फैसला हो जाता है। यह घटनाक्रम दोनों जेलों में चल रहा है। केंद्रीय कारागार के घटनाक्रम को अमर उजाला ने छह फरवरी 2017 के अंक में पेज संख्या तीन पर प्राथमिकता से प्रकाशित किया था।
इसके बाद भी जेल प्रशासन नहीं चेता तो रविवार को बंदियों को समुचित इलाज न मिलने की धधकी चिंगारी शोला बन गई, जिसे दबाने में पुलिस और प्रशासन को नाकों चने चबाने पड़े। नतीजा यह हुआ कि जिले भर का पुलिस फोर्स भी बंदियों के आक्रोश को नहीं रोक सका। बंदियों ने जेल व पुलिस प्रशासन से जमकर मोर्चा लिया। संभालने के लिए डीआईजी जेल आरपी सिंह और जेल मंत्री को यहां आना पड़ा। फिलहाल मंत्री और डीआईजी दोनों जांच-पड़ताल में लगे हैं। बंदी अपने इलाज और भोजन की वेदना इन अधिकारियों के समक्ष व्यक्त कर रहे हैं।