सन् 1857 की क्रांति में फर्रुखाबाद की माटी ने भी फर्ज निभाया था। किसानों
से जबरिया अफीम व नील खेती कराने व कम पैदावार पर जुर्माना से किसानों के
भीतर दबी चिंगारी फूटी थी। इनका यह गुस्सा मौके के इंतजार में दबा रहा। 10
मई को मेरठ में क्रांति भड़कने के बाद इन्हें 18 दिन का इंतजार करना पड़ा
था। इनके विद्रोह ने गोरों को हिला कर रख दिया था।
1857 से ठीक पहले
का दौर किसानों के लिए दर्दनाक था। नवाब तफज्जुल हुसैन रियासत की गद्दी
संभाल चुके थे। ताकत अंग्रेेज कमिश्नर और कलेक्टर के हाथों में आ चुकी थी।
अंग्रेज किसानों पर अफीम और नील की खेती करने का दबाव बना रहे थे। कम उपज
पर इन पर जुर्माना ठोंक दिया जाता था। कोेड़ों से पिटाई होती थी।
अंग्रेजों ने गंगा किनारे पांचाल घाट पर अफीम की कोठी बनवाई थी। अंग्रेज
किसानों को बीज और ददनी देते थे। किसानों को फसल तैयार कर कोठी में जमा
करना होती थी। कम पैदावार पर जुर्माना व पिटाई से किसान तंग आ गए थे।
गुजारा मुश्किल होने लगा। नवाब की मालगुजारी माफी की चिट्ठियों को अंग्रेज
रद्दी की टोकरी में डाल देते थे। नवाब की एक ऐसी ही चिट्ठी पर अंग्रेज
कलेेक्टर नोनियम उखड़ गया। उसने किसानों की बस्ती में आग लगवा दी। बाद में
अपने नाम से नोनियमगंज बस्ती बसाई। यहां से भागे किसानों ने नौगवां बसाया।
किसानों को यह दर्द साल रहा था। 10 मई को मेरठ में विद्रोह के चौथे दिन
फर्रुखाबाद में खबर पहुंचते ही यहां भी विद्रोह की चिंगारी सुलगने लगी। इस
सुगबुगाहट पर 13 मई को ही सैनिकों के हथियार जमा करा लिए गए थे। 14 मई 1857
को मजिस्ट्रेट प्राविन ने खतरे को भांपते हुए हाकिमों को अलर्ट कर दिया
था। 29 मई को फतेहगढ़ की 10 वीं रेजीमेंट में विद्रोह उभरने लगा। 3 जून को
अवध के क्रांतिकारियों के गंगा पार से
यहां आते ही गुस्सा फट पड़ा।
रेजीमेंट के सूबेदार अमीर खां ने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर जेल तोड़ दी।
अंग्रेजों के बंगलों में आग लगा दी। खजाना लूट लिया था। 4 जुलाई को किले
पर कब्जा कर लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ चला बगावत का यह
सिलसिला आजादी मिलने तक जारी रहा था।
1857 की क्रंाति में
फर्रुखाबाद के रणबांकुरों का बड़ा योगदान रहा। उस समय यहां क्रांति का बड़ा
कें द्र था। यहां के लोग आजादी के लिए अपना सब कुछ होम करते रहे। -डा. रामकृष्ण राजपूत, इतिहासकार