आलू की अगेती फसल ने जहां किसानों की उम्मीदाें पर पानी फेर दिया है। वही इस पेशे से जुड़े आढ़तियों, श्रमिकों और ट्रैक्टर व ट्रक चालकों के घरों के चूल्हे ठंडे कर दिए हैं। हालात यह है कि पैसा न होने के कारण आढ़ती पल्लेदारों को मजदूरी में आटा देकर काम चला रहे हैं।
ट्रक व ट्रैक्टर चालकों को डीजल तक का पैसा नही दे पा रहे हैं। किसानों को पैसे के बदले में चेक दिया जा रहा है। जिसका भुगतान किसानों को 40000 रुपये की जगह 4000 रुपये किया जा रहा है।
आठ नवंबर से बंद 1000 और 500 के नोट का असर आलू व्यापारियों से जुड़े मजदूरों पर भी पड़ा है। मौजूदा समय में आलू आढ़ती आलू किसानों के भुगतान की बात तो दूर ट्रैक्टर का किराया तक नहीं दे पा रहे हैं। किसानों को तो चेक से पेमेंट दिया जा रहा है, लेकिन दैनिक मजदूरी करने वालों को 200 रुपये के चेक किस बैंक में लगाए जाए इसको लेकर आलू आढ़ती पेरशान है।
आलू आढ़ती सुधीर उर्फ रिंकू वर्मा का कहना है कि उन्हें बैंक से 50000 रुपये प्रति सप्ताह निकालने की अनुमति है। जबकि 100 ट्रैक्टर वालों को यदि भाड़ा छोड़कर डीजल के दाम दिए जाए तो 10000 रुपये के आसपास प्रतिदिन पैसा खर्च हो रहा है। इनका भाड़ा और किसानों के माल का भुगतान कहां से किया जाए यह बात उन्हें खल रही है।
आलू आढ़ती का कहना है कि एक करोड़ दस लाख कीमत के आसपास आलू प्रतिदिन मंडी में आ रहा है। जिसका भुगतान केवल व्यापारी चेक से कर रहा है। इस चेक पर किसान किस तरह से मजदूरों का भुगतान करें। इसको लेकर मजदूरों के घर चूल्हे ठंडे हो गए है।
आलू आढ़ती धर्मेंद्र गुप्ता का कहना है कि हालात यह है कि पल्लेदारों को मौजूदा समय में वह शिवनारायण आटा विक्रेता के यहां से पैसे के बदले में आटा दिलाकर काम चला रहे है। उनका कहना है कि आखिर कार्य कब तक चलता रहेगा यह उनकी समझ में नहीं आ रहा है।
ममता इंटरप्राइजेज के मालिक सतेंद्र वर्मा का कहना है कि वह मंडी समिति सातनपुर में वारदाना की आपूर्ति करते हैं। उन्हें इसका भुगतान चेक से मिल रहा है और चेक जमा करने पर बैंक निर्धारित रुपये दे रहा है। इस वजह से वह इस चेक से अपना कारोबार नहीं चला पा रहे है।
उनका कारोबार पूरी तरह से प्रभावित हो रहा है। वह भी वारदाना लादने में लगे पल्लेदारों को प्रतिदिन पैसे के बदले आटा देकर काम चला रहे है।