फर्रुखाबाद। रासायनिक खाद के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है। फसल के अवशेष खेतों में सड़ाने के बजाय नष्ट कर दिए जाने और गोबर व हरी खाद न डाले जाने से नाइट्रोजन भी काफी कम मात्रा में पाया गया। मृदा परीक्षण रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है।
किसान रासायनिक उर्वरक की मात्रा बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाने में जुटे हैं। गत वर्ष कृषि विभाग की ओर से सभी सात ब्लॉकों के खेतों से मिट्टी के दो-दो हजार नमूने लेकर जांच कराई गई। कुल 14 हजार नमूनों की जांच में हर जगह नाइट्रोजन और ऑर्गेनिक कॉर्बन की मात्रा बेहद कम पाई गई। फास्फोरस और पोटैशियम मध्यम श्रेणी में मिला। नाइट्रोजन व ऑर्गेनिक कॉर्बन की घटती मात्रा भविष्य के लिए चिंता का विषय है। हालांकि सल्फर, कॉपर, मैग्नीशियम, आयरन व बोरॉन पर्याप्त मात्रा में मिला। गोबर व हरी खाद खेतों में न डाले जाने से जीवांश व काॅर्बन घटते जा रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि जीवांश की कमी होने से फसल में डाली जाने वाली रासायनिक खाद का मात्र 30 प्रतिशत भाग ही पौधे को मिल पाता है, जबकि 70 फीसद उर्वरक बेकार जा रही है। यदि मिट्टी में भरपूर जीवांश हों तो रासायनिक खाद की जरूरत कम पड़ेगी और उत्पादन भी भरपूर होगा।
तीन ब्लॉकों की मिट्टी में घटी जिंक की मात्रा
जांच रिपोर्ट के अनुसार ब्लाॅक राजेपुर, बढ़पुर व कायमगंज के खेतों की मिट्टी में जिंक की मात्रा बेहद कम पाई गई। फसल चक्र न अपनाए जाने से मिट्टी की सेहत सुधर नहीं पा रही है।
किसानों को सचेत होने की जरूरत
उप कृषि निदेशक अरविंद मोहन मिश्र ने बताया कि मिट्टी में जीवांश की कमी पूरी करना बेहद जरूरी है। कोई भी फसल हो, उसमें अनाज किसान का और पौध खेत का होना चाहिए। हरी खाद, ढेंचा, सनई, उर्द, मूंग की फसल करने से सूक्ष्म जीव बढ़ेंगे। गोबर की खाद, जीवामृत व घन जीवामृत डालने से भी जीवांश बढ़ते हैं। जिंक की कमी पूरी करने के लिए फसल चक्र अपनाना बेहद जरूरी है। फसलों के अवशेष खेत में सड़ने से और गोबर की खाद से मिट्टी में सभी कमियां पूरी हो जाती हैं। इससे कम रासायनिक उर्वरक पड़ने पर भी पौधे की जड़ तक पूरी खाद जाती है और उत्पादन बढ़ता है। जीवांश पर्याप्त होने से सिंचाई की भी अधिक जरूरत नहीं होती।