फर्रुखाबाद। गंगा में भैरोघाट के पास गिर रहे गंदे नाले के मुहाने पर मछलियों के मरने के मामले में जिम्मेदारों की एक और लापरवाही सामने आई है।
इस मामले में सख्ती बढ़ी तब नगर पालिका ने माघ मेले के बाद से बंद पड़े बायोरेमेडिएशन प्लांट (जल शोधन करने वाला प्लांट) को रविवार को आनन-फानन में फिर चालू कर दिया।
मंगलवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम प्लांट पर गई तो उसमें भरा पानी लाल था जो यह साबित करता है कि यह भैरोघाट के नाले का पानी है, लेकिन यदि इसका शोधन लगातार होता जलीय जीवों का अपनी जान न गंवानी पड़ती।
नगर पालिका ने भैरोघाट नाले के गंदे पानी का शोधन करने के लिए माघ मेला रामनगरिया के वक्त बायोरेमेडिएशन प्लांट लगाया था। मेला खत्म होते ही पालिका ने इस प्लांट को भी बंद कर दिया था। लिहाजा शहर का बिना शोधन गंदा पानी गंगा में बहता रहा।
आलम यह है कि पालिका की ओर से बायोरेमेडिएशन के प्लांट स्थल पर लगाया गया बोर्ड तिरछा पड़ा है। गंगा के मुहाने पर नाले के गंदे पानी में लाखों मछलियां मरने की अमर उजाला ने 19 अक्तूबर के अंक में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की, तब पालिका को पानी का शोधन करने की सुध आ गई। हालांकि पालिका के जिम्मेदार कार्यदायी संस्था को प्लांट का टेंडर देने की बात कह रहे हैं। साथ ही इसके चालू रहने की बात कह रहे हैं।
20 अक्तूबर रविवार की शाम को आनन-फानन में पालिका ने एक टैंक रखवाकर उसमें पाइप के जरिये पानी टपकाना शुरू कर दिया। मंगलवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने मौके पर जायजा लिया तो बायोरेमेडिएशन टैंक आधे से अधिक पानी से भरा था। पानी का रंग नाले के पानी जैसा लाल था।
जिस स्थान पर टैंक रखा गया है, वहां तक पालिका के पानी का टैंकर पहुंचने का रास्ता नहीं है। इससे साफ है कि टैंक में भरा पानी नाले का ही है। यदि नाले के पानी का शोधन होता रहता, तो मछलियों को मरने से बचाया जा सकता था।