कैरियर और कंप्यूटर की दुनिया में उलझ गई नई पीढ़ी को गुलाम रव्वानी तांबा
का नाम अजनबी सा या बेमतलब लग सकता है। पर बीती सदी के आखिरी दशक तक इस
अजीम शायर की लिखी गजलें, नज्में, सत्ता और व्यवस्था विरोधी आंदोलन की जान
हुआ करती थीं। उनके बेटे पूर्व विधायक इजहार आलम खां ने बताया कि अच्छी बात
यह है कि कई वर्षों बाद कायमगंज वासियों की तरफ से शताब्दी वर्ष मनाया जा
रहा है। इसमें देशभर के शायर व कवि और उनके पुराने साथी शरीक होंगे।
मंगलवार को नगर उनकी स्मृतियों में डूबेगा।
गुलाम रव्वानी के उर्दू अदब
से फर्रुखाबाद को न सिर्फ देश में, बल्कि विदेशों में भी पहचान मिली।
वामपंथी नेता डा. कैसर खां कहते हैं कि इस शायर का जीवन क्रांतिकारी रहा।
वह खुद एक इंकलाबी थे। उन्होंने कायमगंज पितौरा गांव के जमींदार घराने में
जन्म लिया लेकिन जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही जमींदारी के खिलाफ झंडा
बुलंद कर दिया और मजदूरों, किसानों व शोषितों की आवाज बन गए। उन्होंने बड़े
सलीके से आम आदमी की तड़प और सिसक को अपनी शायरी में व्यक्त किया।
कम्युनिस्ट विचारधारा उनका ओढ़ना-बिछौना रही। रंग, नस्ल, धर्म, ऊंच-नीच के
भेदभाव को अपने
जहन में कभी जगह नहीं दी। मरहूम तांबा देश के राष्ट्रपति
रहे डा. जाकिर हुसैन के रिश्तेदार भी थे। मरहूम कांग्रेसी नेता सुल्तान आलम
खां और मरहूम खुर्शीद आलम खां के भाई थे। उन्होंने अपने परिवार की सियासी
हैसियत का फायदा नहीं उठाया, बल्कि सियासत से दूरियां बनाए रखीं। संपूर्ण
क्रांति के पक्षधर तांबा ने कभी अपना कर्मक्षेत्र फतेहगढ़ बनाया तो कभी
दिल्ली। साहित्यिक क्षेत्र में उन्होंने कीर्तिमान बनाए। उन्हें साहित्यिक
सेवाओं के लिए उर्दू एकेडमी गालिब पद्मश्री अवार्ड से नवाजा गया। अब उनका
जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है।
गुलाम रव्वानी तांबा
पिता -जान आलम खां।
पैदाइश- कायमगंज का पितौरा गांव, 28 फरवरी 1914।
निधन- 7 फरवरी 1993 दिल्ली में।
दफन किए गए पैतृक गांव में।
पद्मश्री अवार्ड कर दिया वापस
मरहूम
गुलाम रव्वानी तांबा को साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1971
में पद्मश्री अवार्ड से नवाजा था। वर्ष 1973 में अलीगढ़ में हुए फसाद के
बाद जब उन्होंने इसे रोकने की आवाज उठाई और सरकार ने उदासीनता दिखाई । इस
पर उन्होंने पद्मश्री अवार्ड वापस कर दिया। उन्होंने अपनी आंखें भी दान कर
दी थीं।