फर्रुखाबाद। 23 जनवरी से मेला रामनगरिया शुरू हो रहा है। जनवरी-फरवरी महीने में पांच बड़े स्नान पर्व भी पड़ेंगे। इसके बावजूद गंगा में नालों का पानी सीधे गंगा में समा रहा है। गंगा मइया डायलिसिस पर हैं।
गंगा जल सड़ांध मार रहा है। नालाें के साथ ही वस्त्र छपाई इकाइयों का रंगीन पानी भी गंगा में समा रहा है। गंगा के किनारे शौचालय बन गए हैं। यहां गंदगी और बदबू से चंद मिनट भी गुजारना दूभर है।
23 जनवरी से 23 फरवरी तक बड़ी तादाद में साधु संत और गृहस्थ कल्पवास करेंगे। खास स्नान पर्वों पर भीड़ एक लाख के पार हो जाती है। इतने सब के बाद भी गंगा में नालाें का गंदा पानी जाने से रोकने की कोई कोशिश नहीं है। ऐसे में स्नान पर्वों पर साधु संताें का गुस्सा फूट सकता है।
सोताबहादुरपुर
पांचालघाट पर पुल से पहले सोताबहादुर ग्राम सभा की आबादी बसी है। इनके घरों और शौचालयों का पानी गंगा में आता है। यहां के ज्यादातर लोग घाट पर ही शौच करते हैं। इस बस्ती के नीचे घाट पर बेशुमार गंदगी है। इसकेे चलते यहां चंद मिनट रुकना मुश्किल है। यह सब गंदगी गंगा में समाती है।
धीमरपुरा
धीमरपुरा गंगा तट पर बसा है। यहां का नाला भी गंगा में गिरता है। आसपास के इलाकाें का गंदा पानी भी गंगा में पहुंचता है। यह गंगा की धारा के साथ मिलकर आगे बढ़ जाता है। इसमें सीवर का पानी भी शामिल होता है। यह अरसे से चल रहा है। गंगा में नाले का गंदा पानी जाने से रोकने के लिए बातें कई बार हुईं, पर अमल कुछ नहीं हुआ।
भैरो घाट
अंगूरी बाग इलाके में वस्त्र छपाई और रंगाई के कारखाने हैं। इनमें से सात फीसदी के पास भी ट्रीटमेंट प्लांट नहीं है। कारखानों का रंगीन पानी नाले के जरिए गंगा में पहुंचता है। विश्रातों से भैरो घाट तक कई जगहाें का गंदा पानी नालों व नालियों के जरिए गंगा में समा जाता है। यह पानी गंगा प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह है।