फर्रुखाबाद/कमालगंज। चार जून 1802 से फर्रुखाबाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आया। 1807 तक जिले में अंग्रेज नागरिक प्रशासनिक व्यवस्था पूरी हो गई। यहीं से सात अन्य जिलों का प्रशासनिक प्रबंध होता था। फर्रुखाबाद के लोगों का साहस, निडरता व स्वतंत्रता के प्रति प्रेम को देख अंग्रेजों ने खतरा भांप लिया था। धीरे -धीरे वह जिले का महत्व कम करने में लग गए। 1848 में रेवेन्यू (राजस्व) बोर्ड को आगरा स्थानांतरित कर दिया गया।
देश के प्रति प्रेम व स्वतंत्रता के लिए संघर्ष फर्रुखाबादियों की धरोहर है। ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती शासन काल में ही अंग्रेज अधिकारियों ने इसे भांप लिया था। यही कारण है कि पहले प्रशासनिक व्यवस्था के लिए मुफीद समझ रहे यह जिला और जिले के लोग कंपनी को खटकने लगे।
साहित्य भूषण, यशभारती व रानी अवंतीवाई राज्य पुरस्कार से सम्मानित इतिहासविद डॉ रामकृष्ण राजपूत बताते हैं कि 1807 तक जिला न्यायाधीश, कलक्ट्रेट, रजिस्ट्रार आदि नियुक्तियां हो गईं थीं। गवर्नर जनरल ने अंग्रेज अधिकारी ग्रोम्योर को पहला प्रतिनिधि नियुक्त किया। यहीं से मैनपुरी, एटा, इटावा, हरदोई, शाहजहांपुर, बदायूं, उन्नाव, कानपुर प्रशासनिक प्रबंध होता था। फतेहगढ़ में वर्तमान में जहां बड़ा पोस्ट आफिस है। वहीं टकसाल थी। जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी की मोहर लगे सिक्के तैयार होते थे।
आरपी डिग्री कालेज कमालगंज के समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर आदर्श शुक्ला कहते हैं कि फर्रुखाबाद के लोग अंग्रेज कंपनी के शासन को पचा नहीं पा रहे थे। गवर्नर जनरल को भी भनक लगी कि फर्रुखाबादी बड़े साहसी, निडर, निर्द्वन्द्व और स्वतंत्रता के प्रेमी हैं। अंग्रेजों को भय था कि आगे भी फर्रुखाबाद को प्रशासन की महत्वपूर्ण धुरी बनाए रखा गया तो कंपनी शासन को नुकसान हो सकता है।
इसको देखते हुए पहले दूसरे जिलों में न्यायालय स्थापित कर यहां से न्यायिक काम हटाया गया। 1842 में लखनऊ में सचिवालय स्थापित होने के साथ ही जिले का महत्व और कम कर दिया गया। 1848 में राजस्व बोर्ड आगरा स्थानांतरित हो गया।