मोहल्ला ग्राटगंज की दरगाह में हजरत महमूद शाह वारसी
के उर्स का समाजसेवा के संकल्प के साथ समापन हो गया। इस दौरान महान सूफीसंत
की मजार पर अकीदत के नजराने पेश किए गए। दोपहर में कुल व फातिहा की महफिल
सजी।
गुरुवार को शहर की प्रसिद्ध दरगाह हजरत कली शाह वारसी के कुल व
फातिहा में सुबह से ही अकीदतमंदों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। दोपहर
12.30 बजे कुल व फातिहा की महफिल सजी। इससे पहले कुरआन ख्वानी का आयोजन
किया गया। हाफिज शफीक अहमद खां ने पैगंबरे इस्लाम और सूफियों की समाजी
जिंदगी पर प्रकाश डाला गया।
उन्होंने कहा कि हजरत मुहम्मद मुस्तफा
की सीरत के हर पहलू में इंसानियत का दर्द नुमाया है। उन्होंने न सिर्फ
इंसानों के साथ भलाई करने का पैगाम दिया, बल्कि जानवरों के साथ भी बेहतर
सुलूक करने की तालीम दी। बेटियों की अच्छी तरह परवरिश और मां-बाप की सेवा
करने की नसीहत दी।
संयोजक मोहम्मद जफर वारसी ने कहा कि हजरत महमूद
शाह वारसी 8 सितंबर 1969 को दुनिया से रुख्सत हुए। सारा जीवन सूफी इज्म की
तालीम देकर समाज की सेवा में लगाया। हाफिज मुम्मताज वारसी ने कलाम सुनाया
जो भी चाहे बख्श दे यह है उनका फैसला, कुछ नहीं मेरी तलब उनकी अता के
सामने।
मुन्ना मेहरबान ताज ने कव्वाली की महफिल में ऐसे तराने
सुनाए कि लोग मंत्रमुग्ध हो गए। लोगों ने मुल्क की तरक्की की दुआ मांगी।
इसके बाद लंगर का दौर चला। मतलूब खां, महबूब खां, तैयबमियां, ताहिर हुसैन,
सरदार मीर खां, अब्दुल हमीद, जमील अंसारी, सलीम अंसारी, महताब खां, लाडले,
उजैर अंसारी, पप्पू और मुजीब अहमद भी मौजूद रहे।