फर्रुखाबाद। व्यक्तिगत रूप से संचालित शहर का एक संग्रहालय पांचाल क्षेत्र के इतिहास को समेटे है। नाम है अहिच्छत्रा। यहां सैकड़ों पांडुलिपियां हैं तो भोज व ताम्रपत्र पर लिखी अनेक पुस्तकें भी। हजारों वर्ष पुराने फासिल्स (जीवाश्म), 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लड़ने के लिए प्रयोग में लाए गए अस्त्र-शस्त्र, मोहनजोदड़ो-हड़प्पा आदि क्षेत्रों की सामग्री भी है।
इन बहुमूल्य धरोहरों को नई पीढ़ी से रूबरू कराने के लिए ही 11 साल पहले शहर के पास हाथीपुर में 2.51 करोड़ की लागत से राजकीय संग्रहालय भवन का निर्माण कराया गया था। बावजूद इसके अब तक शासन से संग्रहालय संचालन शुरू नहीं हुआ। ऐसे में अहिच्छत्रा में संग्रहीत ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की सामग्री हस्तांतरित नहीं की जा सकी।
वर्ष 2006-07 में प्रदेश में कन्नौज, पिपरहवा (बहराइच) के साथ ही फर्रुखाबाद के हाथीपुर(अदिउली) में राजकीय संग्रहालय भवन स्वीकृत हुए थे। दूसरे जिले के संग्रहालय प्रारंभ भी हो गए लेकिन 2009 में बनकर तैयार फर्रुखाबाद का संग्रहालय भवन अब तक शुरू नहीं किया जा सका। संग्रहालय का तीन मंजिला आलीशान भवन 11 साल से दुर्लभ, कलात्मक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक समृद्ध अतीत को सहेजने की बाट जोह रहा है।
दुर्लभ व पुरातात्विक वस्तुओं का अनूठा संग्रह
- शहर के पल्ला मंडी स्थित आवास में यशभारती से सम्मनित डॉ. रामकृष्ण राजपूत ने चार दशक पूर्व अहिच्छत्रा संग्रहालय की स्थापना की थी। यहां दुर्लभ व अनूठी पुरातात्विक वस्तुओं का संग्रह है। यहां गुप्त, कुषाण, मौर्यकालीन स्वर्ण सिक्के, स्वर्ण से लिखीं व भोजपत्र और ताड़पत्र पर लिखीं पुस्तकें, तिब्बत आदि के जीवाश्म, अमेरिकी सेना की 180 साल पुरानी दूरबीन, स्वतंत्रता संग्राम के अस्त्र शस्त्र
मोहनजोदड़ो, हड़प्पाकालीन सामग्री, कपड़ा छपाई की हस्तनिर्मित रंगीन आकृतियां, नवाब वाजिद अली शाह का सुरापात्र, मिर्जा गालिब के सन् 1844 में जिले में आगमन पर आम की दावत का चित्र सहित सैकड़ों पांडुलिपियां भी हैं। डॉ. रामकृष्ण कहते हैं कि वह कई जिलाधिकारी से शासन को पत्र भी लिखा चुके हैं। पर अभी राजकीय संग्रहालय शुरू करने की कार्रवाई अंजाम तक नहीं पहुंच पाई।