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लचर सरकारी सेवाओं के कारण निजी अस्पताल कर रहे मनमानी

Tue, 20 Jan 2015 11:10 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला फर्रुखाबाद
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नर्सिंग होम जच्चा-बच्चा की जिंदगी को खतरा दिखा कर जेबें भर रहे हैं। नार्मल डिलीवरी होने की स्थिति में भी आपरेशन के जरिए बच्चे पैदा कर मोटी कमाई की जा रही है। कई नर्सिंग होम इसी के बूते चल रहे हैं। इनके संचालकों ने शिकार फांसने के  लिए एजेंट छोड़ दिए हैं। यह सरकारी अस्पतालों व जिला अस्पताल में चक्कर लगाते रहते हैं। गांव देहात से
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आने वाली प्रसूताआें को सरकारी अस्पतालाें में बदइंतजामियाें का भय दिखाकर नर्सिंग होम में दाखिल करा दिया जाता है। इसके लिए एजेंटाें का कमीशन तय है। नर्सिंग होम में प्रसूता के पहुंचने पर शुरू होती है भगवान कहे जाने वाले डाक्टरों की ब्लैकमेलिंग। यह प्रसव में दिक्कतें बताकर सिजेरियन प्रसव करा कर मोटा बिल बना देेते हैं। प्रसूता के परिजनाें को यह बिल कर्ज लेकर भरना पड़ता है।

नर्सिंग होम में सीजेरियन का अनुपात ज्यादा
स्वास्थ्य विभाग के ही आंकड़ों से ही करोड़ों रुपये के इस गोरखधंधे का पर्दाफाश हो जाता है। अप्रैल से दिसंबर 2014 तक प्राइवेट व सरकारी अस्पतालाें में  22,296   प्रसव हुए। इनमें से सरकारी अस्पतालोें में 13,210 डिलेवरी हुईं। यहां 195  बच्चे आपरेशन से हुए। नर्सिंग होम में अप्रैल से दिसंबर 2014 तक 9086  प्रसव हुए। इनमें  199 बच्चे आपरेशन से
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पैदा हुए। कुल डिलेवरी व आपरेशन से हुए प्रसव का अनुपात नर्सिंग होम का प्रतिशत ज्यादा है। सवाल यह है कि आखिर सरकारी अस्पतालाें में सीजेरियन कम क्याें हुए। दरअसल दूरदराज से आने वाली गर्भवती महिलाआें के परिजनाें को कोई न कोई कमी बताकर इतना भयभीत कर दिया जाता कि वह नर्सिंग होम जाने के लिए मजबूर हो जाएं। सरकारी

अस्पताल में मौजूद दलाल, एंबुलेंस चालक मरीज को आसानी से जाल में फंसाकर अपने चहेते नर्सिंग होम पहुंचा देते हैं। इसके बदले यह मोटा कमीशन पाते हैं। सीजर केस में नर्सिंग होम 15 से 20 हजार रुपये की वसूली कर लेते  हैं। प्रसूता के एक बार भर्ती हो जाने के बाद डाक्टर के इशारे पर चलना गर्भवती के परिजनों की मजबूरी हो जाती है। डाक्टरों की मानें तो आपरेशन तभी करना चाहिए जब जच्चा बच्चा की जान पर बन आए। यहां तो केवल वसूली के लिए नार्मल डिलेवरी नहीं की जाती है।

युवा दिखने की चाहत ने बढ़ाई कमाई
नार्मल डिलेवरी के बाद शरीर के कई अंगों में बदलाव आ जाते हैं। कई महिलाएं ऐसी हैं जो मां बनना चाहतीं हैं , लेकिन इन्हें फिगर के साथ समझौता मंजूर नहीं है। मां बनने के बाद भी जवां दिखने की चाहत के कारण यह स्वयं भी डाक्टर से आपरेशन के लिए कहती हैं। हालांकि फर्रुखाबाद जिले में ऐसी महिलाओं का प्रतिशत काफी कम है।

ग्राहक की नजर से देखे जाते मरीज
नर्सिंग होम में भर्ती होने के बाद प्रसूता के परिजनाें पर मानसिक दबाव बना दिया जाता है। इससे वह कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं रहते। प्रसूता के भर्ती होते ही ब्लड टेस्ट, हीमोग्लोबिन, यूरीन, अल्ट्रासाउंड आदि की जांचाें के लिए कह दिया जाता है।  तीमारदार को यह नहीं बताया जाता कि यह जांचें क्याें कराई जा रही हैं। कमाई के कारण अधिकतर नर्सिंग होम कैंपस में ही जांच की यह सारी सुविधाएं भी मुहैया करा देते हैं।

सरकारी अस्पतालों में प्रसव की स्थिति
माह      सामान्य      आपरेशन
अप्रैल     713          11
मई        1078         22
जून        1365         28
जुलाई     1526         26
अगस्त     1893       28
सितंबर     1899      16
अक्टूबर     1639     26
नवंबर      1556      13
दिसंबर 1541           25

नर्सिंग होम में प्रसव की स्थिति
माह      सामान्य      आपरेशन
अप्रैल   575         30
मई    884          18
जून     967         17
जुलाई    897       26
अगस्त  1017       23
सितंबर  1216       19
अक्टूबर  1178     28  
नवंबर    1175      16
दिसंबर   1175       22

रेट लिस्ट तक नहीं
जिले के ज्यादातर नर्सिंग होम पर रेट लिस्ट तक नहीं है जबकि लाइसेंस की शर्त में लिस्ट लगाना अनिवार्य बताया गया है। मरीजों का चेहरा देखकर बिल बनाया जाता है। कभी-कभी तो सीजर केस के बाद नवजात शिशु को मशीन में रख दिया जाता है। कई बार ऐसा बिल बढ़ाने के लिए किया जाता है। सीजर के बाद यदि शिशु मशीन में पहुंच गया तो बिल 50 हजार के ऊपर पहुंच जाता है।

अल्ट्रासाउंड से खतरा
नर्सिंग होम के डॉक्टरों के  द्वारा प्रेग्नेंसी पीरिएड में कई बार अल्ट्रासाउंड कराया जाता है। जानकारों के मुताबिक अल्ट्रासाउंड मशीन में रेडिएशन होता है जो आम आदमी के लिए खतरनाक है।

हालत बिगड़ने पर करते रेफर
वैसे तो नर्सिंग होम संचालक मरीजों को हर प्रकार की सुविधा देने का दावा करते हैं, लेकिन जब गर्भवती की हालत बिगड़ती है तो हाथ खड़े कर देते है। मरीज को जिला अस्पताल या लोहिया अस्पताल के लिए रेफर कर दिया जाता है। रिकार्ड देखा जाए तो जिला और लोहिया महिला अस्पताल में प्रति माह ऐसे कई केस पहुंचते हैं जो नर्सिंग होम में बिगड़े होते हैं।

सरकारी अस्पतालाें की अपेक्षा नर्सिंग होम में आपरेशन से ज्यादा प्रसव के मामले की जांच कराई जाएगी। यह भी संज्ञान में आया है कि नर्सिंग होम आपरेशन से प्रसव की संख्या कम भेजते हैं। इन्हें इस बावत नोटिस भेजा जाएगा। 102 एंबुलेंस से आने वाली प्रसूताआें का रिकार्ड चेक कराया जा रहा है। दलालाें पर भी नजर रखी जा रही है।
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डा. राकेश कुमार, सीएमओ


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