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शुरू हो गया इबादत का महीना

Thu, 11 Jul 2013 05:31 AM IST
Farrukhabad
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फर्रुखाबाद। मुकद्दस रमजान के चांद का ऐलान होते ही मुस्लिम इलाकों का नजारा बदल गया। इसके साथ ही अहले ईमान का सब्र व शुक्र का इम्तिहान शुरू हो गया। एकाएक मस्जिदों में नमाजियों की तादाद में इजाफा हो गया। पहले रमजान से रोजादारों की दिनचर्या भी बदल जाएगी। करीब 3 बजे रात सहरी के लिए जागेंगे और सूर्यास्त तक भूख, प्यास बर्दाश्त करेंगे। रातें इबादत में गुजरेंगी।
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माहे मुकद्दस का चांद बुधवार को दिखने की तस्दीक बड़े आलिमों ने कर दी। उसी के साथ मुसलमानों ने तरावीह की नमाज के लिए मस्जिदों की ओर रुख कर लिया। यहां एकाएक नमाजियों की तादाद में इजाफा हो गया। यह पहले से तय था कि पहला रोजा गुरुवार को रखा जाएगा। इसके लिए लोगों ने मस्जिदों की साफ-सफाई और लाउडस्पीकर के इंतजाम दुरुस्त किए गए। इतना ही नहीं घरों में महिलाएं भी पहला रोजा रखने की तैयारियां करती रहीं। बच्चों में रमजान को लेकर खासा उत्साह रहा। इशां की अजान होते ही लोग मस्जिदों में तरावीह की नमाज के लिए पहुंचे। दीनदार महिलाओं ने घरों में इबादत कर रमजान में इबादत करने की हिम्मत अता करने की दुआ की।

नेकी का सबक देता है रोजा
रोजे की हालत में रोजादार को नेक काम करना चाहिए और हर भलाई का शौकीन बन जाना चाहिए। खास तौर से उसके दिल के अंदर दूसरे लोगोें की सहानुभूति का जज्बा पूरी तीव्रता से पैदा होना चाहिए। क्योंकि वह खुद भूख, प्यास महसूस कर सकता है कि अल्लाह के दूसरे बंदों पर गरीब और मुसीबत में क्या गुजरी है।
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- डा. हाजी अनवार अहमद

रोजे का उद्देश्य फर्ज किया
रोजे का उद्देश्य उल्लाह ने मुसलमानों पर फर्ज किया ताकि वह नेकी करने वाले बन जाएं। सबसे बड़ी बात यह है कि रोजा इंसान के दिल में खुदा का खौफ पैदा करता है। रोजे का सब्र व शुक्र बरतने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- हाजी सेठ तरीक अहमद

रोजे में होती है आजमाइश
अल्लाह हर साल पूरे माह तक मुसलमानों के ईमान का इम्तिहान लेता है। उसकी आजमाइश पर खरा उतरने वालों के ईमान में इजाफा करता है। रमजान के रोजे का मकसद है कि इस्लामी नियम पर अमल करने की मजबूत क्षमता पैदा हो जाए।
-हाजी ज्याउद्दीन

सातवीं तरावीह में कुरआन होगा मुकम्मिल
फर्रुखाबाद। हाजी मोहम्मद इस्लाम शमसी ने बताया कि इस बार अंगूरी मस्जिद में रमजान की 6 तारीख को सातवीं तरावीह की नमाज में कुरआन मजीद हाफिज अतीकुर्रहमान मुकम्मिल करेंगे। उन्होंने बताया कि कई वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है।

हाफिजों की बढ़ी डिमांड
फर्रुखाबाद। माह रमजान में पढ़ी जाने वाली खास तरावीह की नमाज शहर व देहात की सभी छोटी-बड़ी मस्जिदों में पढ़ी जाती है। इस नमाज की इमामत हाफिज करते हैं इसलिए हाफिजों की डिमांड बढ़ गई है।
मुकद्दस रमजान का महीना मुसलमानों के लिए काफी महत्व रखता है। वैसे तो इस महीने में पांचों वक्त नमाजे आम आम दिनों की तरह ही पढ़ी जाती है, लेकिन रात में पढ़ी जाने वाली इशां के वक्त 20 रकअत तरावीह की विशेष नमाज पढ़ी जाती है। इसमें हाफिज इमामत करते हुए कुरआन सुनाते हैं। यही वजह है कि इस दौरान हाफिजों की मांग बढ़ गई है। हाफिज भी कुरआन सुनाने को काफी उत्साहित हैं। कुरआन मुकम्मिल होने पर हाफिजों को तोहफे देने का प्रचलन है। हाफिज खुर्शीद कहते हैं कि हाफिजों का मेहनताना तय नहीं होता है। मस्जिदों के मुतवल्लियों की तरफ से जो कुछ भी मिलता है, उसे सहर्ष कुबूल कर लेते हैं।
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