शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो चुका है। इसके तहत निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है। लेकिन हकीकत यह है कि निजी स्कूलों के दरवाजे गरीब बच्चों के लिए नहीं खुल पाए हैं। ऐसे में शिक्षा का अधिकार कानून बेमानी साबित हो रहा है।
अमूमन देखने को मिलता है कि अधिकांश स्कूल इन नियमों का पालन सही तरीके से नहीं कर रहे हैं, जिससे गरीब बच्चों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। माध्यमिक शिक्षा विभाग सुसंगत तथ्यों के साथ शिकायत का इंतजार कर रहा है। जबकि निजी स्कूलों का प्रबंध तंत्र इतना सतर्क है कि वह ऐसा कोई साक्ष्य ही नहीं देता कि गरीब बच्चा मजबूती के साथ अपनी पीड़ा बयां कर सके।
जिले में करीब 330 निजी स्कूल हैं। इसमें तीन सौ स्कूल माध्यमिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त हैं, जबकि 30 विद्यालय सीबीएसई व आईसीएससी बोर्ड के हैं। विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि निजी स्कूल अपने यहां गरीब बच्चों को प्रवेश देने में आनाकानी करते हैं। प्रवेश के दौरान स्कूल प्रबंधन बड़ी सतर्कता बरतता है। वह कोई ऐसा प्रमाण नहीं छोड़ता है, जिससे गरीब बच्चा या उसके अभिभावक सुसंगत साक्ष्यों के साथ डीआईओएस को शिकायत कर सकें।
25 प्रतिशत गरीब बच्चों को शिक्षा देने के अधिकार को निजी स्कूलों ने ठेंगा दिखा दिया है। हाल यह है कि माध्यमिक शिक्षा विभाग के पास अभी तक किसी गरीब बच्चे या उसके अभिभावक की ओर से प्रवेश नहीं देने को लेकर कोई शिकायत नहीं आई है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिक्षा का अधिकार कानून के प्रति लोगों में जागरूकता का अभाव है।
निजी स्कूलों में गरीब बच्चों का प्रवेश नहीं होने से संबधित शिकायतें और उनके निस्तारण की जानकारी शिक्षा भवन से ली गई तो पता चला कि अभी इस बाबत विभाग के पास किसी ने शिकायत ही नहीं दर्ज कराई है।
निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत गरीब बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है। हमारे पास अभी तक ऐसी एक भी शिकायत नहीं आई है। सुसंगत साक्ष्यों के साथ शिकायत होगी तो जांच कर कार्यवाही की जाएगी।- राजेंद्र कुमार पांडेय, डीआईओएस