अयोध्या। सरयू में बहते गोवंशों के शवों को निकालकर अंतिम संस्कार करते-करते रितेश मानवता की सेवा के पुजारी बन गए। अब गोवंशों की सेवा के साथ ही लावारिस शवों का अंतिम संस्कार उनका उद्देश्य बन गया है। गोवंशों की सेवा के लिए कोई भी एक फोन करता है तो रितेश बिना देरी किए पहुंच जाते हैं।
रितेश दास, अयोध्या में सरयू तट पर लक्ष्मण किला के पास रहते हैं। बचपन में ही सिर से पिता राजेश मिश्र का साया उठ गया। मां से संस्कार सीखा। भगवान भोले के भक्त हैं। नंदी के प्रति श्रद्धा का भाव जागा। सरयू के तट पर रहते, बहते जानवरों के शव के प्रति संवेदना इस कदर जागी कि बचपन से ही उन्हें निकालते और सरयू की रेती में गड्ढा खोदकर अंतिम संस्कार करते। मकसद सरयू की पवित्रता बनाए रखना थी। सरयू की पवित्रता की मुहिम भी चलाते हैं। धीरे-धीरे बेजुबानों के प्रति उनका अनुराग बढ़ता गया। अंतिम संस्कार के साथ ही घायल पशुओं के इलाज की सेवा का भाव जागृत हुआ। एक फोन पर वह घायल पशुओं की सेवा के लिए पहुंच जाते हैं। सेवा भावी रितेश गोवंशों के साथ ही मनुष्यों के लावारिस शवों का भी अंतिम संस्कार करवाने लगे।
उन्होंने बीते तीन साल में सरयू तट पर डेढ़ हजार से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कराया। जज्बा तो कोरोना के दौर में देखने को मिला। रितेश ने अपने जीवन की परवाह किए बगैर लगभग 300 से अधिक कोरोना संक्रमित मृतकों का अंतिम संस्कार कराया। अब तक वह छह हजार से अधिक गोवंशों का भी अंतिम संस्कार करा चुके हैं।
इसकी व्यवस्था के सवाल पर बताते हैं कि पहले तो किसी तरह स्वयं करते थे लेकिन अब गोवंशों के अंतिम संस्कार के लिए नगर निगम से वाहन की मदद मिल जाती है। लावारिस शवों के अंतिम संस्कार पर बोले कि नगर निगम के प्रथम महापौर ऋषिकेश उपाध्याय के रामायण ट्रस्ट से संचालित लकड़ी बैंंक से उन्हें लकड़ियां मिल जाती हैं। वह सरयू तट पर शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। कुछ अन्य लोग भी शवों के अंतिम संस्कार में मदद करते हैं। मानवता की सेवा के लिए पूर्व डिप्टी सीएम डा. दिनेश शर्मा ने सम्मानित किया था। कुछ अन्य संस्थाएं भी रितेश को सम्मानित कर चुकी हैं।