‘सिया रानी का अचल सुहाग रहे, राजा राम के सिर पर ताज रहे’, ‘ मोरी छोड़ो न बहियां अवध सइयां’, ‘दूल्हा देखि दुआरी, अरि मन मोह गयो हमरा’, ‘युग युग जीवे युगल वर जोरी’, ‘छोड़ के आ जा तू सजनवां अब रजधनिया हो, करैक बा रजऊ मैया जी कै पुजनिया हो’, ‘राम जी से पुछैं जनकपुर के वासी, बता दिया बबुआ लोगवा देत काहे गारी’ जैसे विवाह के गीत व गारी का गायन मठ-मंदिरों में गुंजायमान होती रही।
रविवार देर रात तक चले विवाह के उल्लास में डूबे संत-धर्माचार्य व श्रद्धालुओं ने दूसरे दिवस लौकिक व वैदिक परंपरा के अनुसार कलेवा, नेग व न्यौछावर रस्म के दौरान अपनी आस्था निवेदित की। देर शाम तक मंदिरों में आयोजित विवाहोत्सव के आयोजन शबाब पर रहे।
रविवार की शाम श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न की बारात के मिथिला में पहुंचने के बाद चारों भाइयों का विवाह देर रात तक वैदिक रीति-रिवाज के साथ आयोजित हुआ। एक तरफ वेद मंत्रों की गूंज के बीच फेरे लिए जाते रहे तो दूसरी तरफ सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत-संगीत की धुन में श्रद्धालु भक्त निमग्न रहे।
विवाह के बाद श्री सीताराम परंपरानुसार कलेवा, नेग व न्यौछावर रस्मों का आयोजन सोमवार को हुआ। प्रसिद्ध बिअहुति भवन, बड़ा स्थान दशरथ महल, कनक भवन, रामसखी मंदिर, दिव्यकला कुंज, रंग महल, जानकी महल ट्रस्ट, मंत्रार्थ मंडपम, रंगमहल, श्रीराम बल्लभाकुंज, सद्गुरु सदन, लक्ष्मण किला आदि मंदिरों में कलेवा रस्म का उल्लास देर शाम तक रहा।
युगल उपासना से जुड़ी तुलसीनगर स्थित बिअहुति भवन सीताराम विवाह की जीवंतता प्रगाढ़ होती दिखी। बता दें कि बिअहुति भवन में भगवान श्रीसीताराम की वर्ष भर विवाहोपासना की जाती है।
सीताराम विवाहोत्सव को ही ध्यान में रखकर पीठ में भगवान राम के पक्ष अयोध्या और सीता के पक्ष जनकपुर के रूप में स्थापित दो प्रखंड रास बिहारी कुंज और बिअहुति भवन में देर रात व दूसरे दिवस देर शाम तक पारंपरिक विवाह रस्म का उल्लास प्रस्फुटित होता रहा।
रामकोट स्थित दशरथ जी का राजमहल बड़ा स्थान, प्राचीन जगन्नाथ मंदिर, श्रीराम बल्लभाकुंज में वैष्णव परंपरा के रीति-रिवाज के अनुसार मिथिला राज के समान आयोजित विवाह रस्म का आयोजन भगवान श्रीसीताराम विवाह के क्षणों को जीवंत करता दिखा। संत-धर्माचार्यों के साथ श्रद्धालु मिथिला और अयोध्या के बीच विभाजित हो एक दूसरे बाराती व घराती के बीच के रस्मों रिवाज की अठखेलियां लोगों को लुभाती रहीं।