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त्रेता युग से ही गुरु परंपरा की संवाहक रही है रामनगरी

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अयोध्या। रामनगरी त्रेतायुग से ही गुरु परंपरा की संवाहक रही है। सदियों बाद भी रामनगरी का आध्यात्मिक जगत साधक संतों की आभा से आलोकित है। रामनगरी की समृद्ध गुरू परंपरा का सूत्रपात तो त्रेतायुग से ही हो गया था।
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अयोध्या गुरू वशिष्ठ जैसे संतों की साधना स्थली रही, जिन्हें स्वयं अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान श्रीराम ने गुरू के रूप में शिरोधार्य किया था। गुरू वशिष्ठ से शुरू हुई रामनगरी की गुरू परंपरा सदियों बाद भी निरंतर समृद्ध होती चली आई है।
आज भी गुरू परंपरा का निर्वहन पूरी श्रद्धा-भक्ति व प्रतिबद्धता के साथ किया जाता है। गुरुपूर्णिमा के पर्व पर रामनगरी का आध्यात्मिक जगत आचार्यों की स्मृति से आलोकित हो उठता है।
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अयोध्या सिद्ध संतों की साधना व तपोस्थली रही। गुरू पूर्णिमा के अवसर पर रामनगरी के इन सिद्ध संतों की स्मृति फलक पर होगी। विभिन्न मंदिरों में गुरु पूजन के साथ-साथ इन आचार्यों के बताए मार्गों का अनुसरण करने का भी संत व भक्त संकल्प लेंगे।
रामनगरी में बाबा राम प्रसादाचार्य, स्वामी रामवल्लभाशरण, मणिरामदास, उमापति त्रिपाठी, महंत सरयू शरण, बावन महाराज, जगद्गुरू हर्याचार्य, स्वामी युगलानन्य शरण जैसे संतों-आचार्यों की लंबी फेहरिस्त है, जिनकी कीर्ति देश-विदेश तक रही।
दशरथमहल के संस्थापक रामप्रसादाचार्य के बारे में कहा जाता है कि माता किशोरी ने उन्हें स्वयं तिलक किया था, जो आजीवन अमिट रहा। यहीं से बिंदु संप्रदाय का भी शुभारंभ हुआ।
बावन मंदिर के संस्थापक बावन जी महाराज पहुंचे संत है। उनकी सिद्धि इस तरह थी कि उनका माता किशोरी से साक्षात्कार होता था। मंदिर के वर्तमान महंत वैदेही वल्लभ शरण बताते हैं कि माता किशोरी जी की प्रेरणा से ही बावन जी महाराज ने एकादशी पर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा शुरू कर दी। यहां प्रत्येक एकादशी को व्रत रहने के बजाय माता किशोरी व ठाकुर जी को कढ़ी, दाल व चावल का भोग लगता है।
रामानंद की आचार्य परंपरा रामनगरी के यशस्वी संत स्वामी हर्याचार्य से सुशोभित हुई। हर्याचार्य जी अपनी विदवता एवं साधुता के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध थे। स्वामी श्रीराम वल्लभाशरण के बारे में कहा जाता है कि उन्हें वाक सिद्धि थी।
वहीं वशिष्ठ पीठ के रूप में विख्यात तिवारी मंदिर के संस्थापक पंडित उमापति त्रिपाठी को गुरू वशिष्ठ का अवतार माना जाता था। गोकुल भवन के संस्थापक राममंगल दास की गणना सिद्ध संतों में होती है। कहा जाता है कि साधना के क्रम में उन्हें हनुमान जी के दर्शन हुए थे।
अयोध्या में बाबा रघुनाथ जी उच्चकोटि के संत हुए हैं। सिद्धि के बल पर अपनी माता को बैकुंठ प्राप्त कराना, संतों की जमात के लिए लंबे समय तक भोजन आदि की व्यवस्था बैठे-बैठे हो जाना, बीमार व्यक्ति को आशीर्वाद देकर, स्पर्श कर स्वस्थ कर देना उनके लिए सामान्य बात थी।
अयोध्या ऐसे ही दिग्गज आचार्यों, संतों की तपोभूमि के रूप में विख्यात रही है। संतों का मानना है कि अयोध्या की गुरू परंपरा सदियों तक अक्षुण्ण रहेगी।
वशिष्ठ पीठ के पीठाधिपति महंत गिरीशपति त्रिपाठी कहते हैं कि भगवान राम ने स्वयं कहा है कि गुरू वशिष्ठ कुल पूज्य हमारे, जिनकी कृपा दनुज हम मारे...। भगवान राम के जीवन में साधक संतों की अहम भूमिका रही है।
गुरू वशिष्ठ से विद्या मिली तो गुरू विश्वामित्र ने युद्ध कला में निपुण किया। वनवास के दौरान भी भगवान राम को अनेक ऋषियों का आशीर्वाद मिला जिसका परिणाम रहा कि उन्हें राक्षसों का संहार करने में सफलता मिली।
वनवास, राजकाज, युद्ध से लेकर आध्यात्मिकता तक हर जगह भगवान श्रीराम को गुरू की कृपा से ही सफलता प्राप्त हुई, यह वह स्वयं स्वीकार करते हैं।
ज.गु. रामदिनेशाचार्य अयोध्या की समृद्ध गुरू परंपरा के बारे में बताते हैं कि अयोध्या संतों की सराय कही जाती है। संत की परंपरा तो गुरू से ही होती है। जब तक गुरू के चरणरज नहीं लगाए जाते तब तक उसके अंत करण के चक्षु नहीं खुलते हैं।
यही कारण है कि जब पृथ्वी पर परमात्मा अवतरित हुए तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ के चरण रज को अपने मस्तक पर शिरोधार्य किया। भगवान राम गुरू वशिष्ठ के बारे में कहते हैं सब पायौ रज पावन पूजै...जो कुछ मिला है वह आपके चरण रज की कृपा से ही मिला है।
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अयोध्या की समृद्ध गुरू परंपरा के मूल में निश्चित रूप से वशिष्ठ जी महाराज ही हैं। जिन्हें भगवान को भी अपना शिष्य बनाने का गौरव प्राप्त हुआ है।
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